दहेज़ की आग

सिसकती हुई वो आवाजेंl
चीख-चीख के कह रही l
माँ अब तु मुझे बचा ले l
दहेज़ अग्नि में दहक रही ll

जन्म लिया क्या गलती की ?
परायो को भी अपना लिया l
चंद कागज़ के टुकड़ो खातिर l
मुझसे कैसा ये बदला लिया ll

कहाँ गये, वो सात वचन ?
निभाने का जो वादा किया l
वादे की थी,वो साक्षी अग्निl
उसी के हवाले मुझे किया ll

करती थी मन से उनकी सेवा l
ना कभी मैंने कोई शिकवा की l
फिर क्यों लालच के भेडियो ने l
मार-मार के मेरी ये हालत की ll

इसकी तुम भी हो, दोषी माँ l
जो चाहा वो तुमने इन्हे दिया l
और बढ़ता गया इनका लालच l
तभी आज इन्होने ऐसा किया ll

माँ नहीं होता अब मुझसे सहन l
मुझको तू ,अपने पास बुला लेंl
नहीं चाहिए मुझे तुझसे कुछ भी l
बस इन भेडियो से मुझे बचा लें ll

हाथ जोड़ कर करती हू विनती l
आओ मिलकर ये कदम उठाये l
करें ब्याह उन्हीं से अपनी बेटी l
जो बिन दहेज़ के ब्याह रचाये ll

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4 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 02/06/2016
  2. Rajeev Gupta Rajeev Gupta 02/06/2016
  3. विजय कुमार सिंह 02/06/2016
  4. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 03/06/2016

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