ना जाने क्यों…???

ना जाने क्यों ऐसा लगता हैं….
हर इंसान अपनी शक्ल पर,
एक नयी शक्ल रखता हैं

ज़माने का तो रुख ही अलग हैं …
यहाँ तो लोग अपनों से ही,
फ़रेबी का रिश्ता रखता हैं

ना जाने क्यों लोग झूठ में जीते हैं…
यहाँ तो कोई सच से,
वास्ता ही नहीं रखता हैं

चलते-चलते राह में कोई
अपना पराया बन जाता हैं…..
तो कोई पराया अपना सा लगता हैं

कभी अकेलेपन में भी अपनों का साथ होता हैं….
तो कभी भीड़ में भी,
अकेलापन सा लगता हैं.

ना जाने इस ज़िन्दगी का मकसद क्या हैं…..
कभी कभी हमारा मकसद भी
एक ख्वाब सा लगता हैं.

ना जाने क्यों ऐसा लगता हैं…..

2 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 02/06/2016
  2. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 03/06/2016

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