अकर्मण्य ईश्वर- निर्मल कुमार पाण्डेय

ईश्वर
सधे तीन अक्षर
अपराधियों की फेहरिस्त में सबसे ऊपर
कहते हैं,
सृस्ती का रचयिता है
सर्वगा है
सब जानता है
देखता है
अतिवादियों को दंड औ भक्तो को सुख बांटता है
अरे,
मैं कहता हूँ
वो अँधा है
अज्ञानी है
अकर्मण्य और अभिमानी है
गर देखता तो, दुःख भी देखता
तब,
लोग यूँ असहाय बेहाल न होते
तन ध्हकते, यूँ फटेहाल न होते
अपने को सर्व शक्तिमान कहता है न!
पर
मैं तो तभी कहूँगा
जब बहाली फटेहाली कंगाली न होगी
जब बिन तेल बिन बाटी दिवाली न होगी
अन्यथा,
जो मानते हैं माने
(मैं नही मानता)
वो भी न मानेंगे
जब विपरीत धरे मिलेंगे
फूलों की जगह कीचड़ खिलेंगे
कांटे मिलेंगे
तब,
ईश्वर भी
(पता नही है भी या नही)
रोयेगा
क्रान्ति होगी , उत्प्लावन होगा
पीडितों की पीड़ा मार डालेगी उसे
शोषितों का शोषण जीने न देगा
जब,
शोषित- पीड़ित-दलित
ईश्वर विद्रोह पर आएगा
तब,
ईश्वर भी उल्टे पैरों जा गर्भ में समाएगा
और तब,
( पता नही कब?)
न शर्म न कोई दुःख होगा
असमानता का राक्षसी मुख न होगा
चहुँ और सुख और केवल सुख होगा

—-निर्मल कुमार पाण्डेय

2 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 27/06/2016
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 27/06/2016

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