मानव व्यथा- निर्मल कुमार पाण्डेय

मानव व्यथा
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याद नही आता कब की बातें
शायद कल ही की हों
स्मरण कर उस क्षण को
जब झुरमुटों जंगलो बीहड़ो में मै नंगा
निर्भीक और निश्छल होकर
पानी की नरमी और धूप की गर्मी की
परवाह किए बिना
घूमा करता
मन रोमांचित सा हो जाता

तब,
व्योम भी दूर था, वसुंधरा भी
पेड़ों की फुनगियां औ पतंगों की ऊँचाईयाँ भी
सागर के गर्त हो हिमगिरी के शिखर पर्त भी
तब,
मन मेरा पंछी बन
छूने को उन्हें
उछलता, कूदता, चुम्बन करता
जब याद करू वो विस्मृत क्षण
मन अपरम्पार खुशी पाता

तब,
पास था मेरे- केवल वो स्नेह, वो वात्सल्य
झरनों में अपनत्व पूर्ण कल-कल
वो छल छल
जगती का छलहीन नीरव निर्मल जल
छूने को उन्हें मन हंस बन
तैरता, घूमता, विहार करता
जब याद करू वो बीते पल
मानस रहता, मन भर आता

पर
पलक झपकते ही मानो
ब्रम्हविश्व ही बदल गया हो
कल का कलरव ‘कल’ आज मलिन हो पिघल गया हो
अब तो,
न वो झुरमुट, न बीहड़, न ही जंगल
न वो गर्मी, न वो झरनों की कल कल
छलहीन नीरव निर्मल जल भी नही है
और न ही है वो दूरी
जो हमें
आकाश और जमीं से
सागर गर्त और हिमगिरी पर्त से अलग किए हुई थी

अब उन,
वृक्षों के शिखर, अन्तरिक्ष मुखर
मै मानव खग उन्हें
उनके अस्तित्व को छूकर
बीच की दूरी मिटाते हुए
मानो,
कह रहा हूँ
‘अब वो दूर नही हैं,

पर मिटाते हुए बीच की दूरी को
शायद छोड़ अपनी धुरी को
अपनों के सपनो से, उनके प्यार से
मातृ-वत्सल धरा दोहन कर संसार से
मैं दूर होता चला गया

अब तो
मै निर्भीक चल भी नही सकता
डर है छालों का
फूलों से गालों का
धूप की नरमी का
पानी की ‘गर्मी’ का

अब,
पहले सा नंगापन तो नही
पर चरित्र गन्दा हो गया है
वो स्नेहिल मानव मन नंगा हो गया है
विकास की होड़ में कहीं
अपना अस्तित्व न मिटा बैठूँ
स्वर्ग की चाह में उड़ता ‘मै’
चाहता हूँ ‘कल’ में जा लौटूँ

कभी कभी करता है मन फ़िर वहीँ जाने को
वही प्रेम-वात्सल्य, निर्भीक निश्छलता पाने को

चाहता हूँ,
वही झुरमुट, वही जंगल, वही नंगापन
क्यों कि उसमे मिलता है सुकून

यहाँ इर्ष्या है, द्वेष है
घृणित मन, दुर्भिक्ष तन शेष है
और,
वहाँ है वो सब कुछ
जो यहाँ नही है…

कमियों की बाढ़ में डूब गया हूँ
नही रहना मुझे
लौट जाना चाहता हूँ
आज से
वर्तमान से
इस दुनिया-बियाबान से
ऊब गया हूँ मैं…

—निर्मल कुमार पाण्डेय

3 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 27/06/2016
  2. C.M. Sharma babucm 27/06/2016

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