तुम्हारा वियोग

तुम्हारा वियोग

तुम्हारे इस वियोग से
फू ट पड़ा शब्दों का भंडार,
लिखी छोटी सी कविता
बन गया मैं भी रचनाकार ।
एक छोटे से घड़े में
शब्द समाये थे असीमित
लगी जो ठोकर हमें तो
छाप गई घड़े की मिट
मिट्टी में मिल गई मिट्टी
शब्दों का उड़ चला गुब्बार ।
तुम्हारे इस वियोग से
फू ट पड़ा शब्दों का भंडार।
उड़ती हुई गुब्बार रूपी धूल में
चुने हुए उन कंपित शब्दों से
बनने लग स्वर और व्यंजन
और बनने लगी पंक्तियां धूल में
कलम छांट कर लिखने लगी
लाने लगी कागज पर उभार ।
तुम्हारे इस वियोग से
फू ट पड़ा शब्दों का भंडार ।

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