कड़वा सच

जिसमें हिम्मत हो कड़वा सच पढ़ने की वही पढे इन पंक्तियों को —

गौमाता ;
हमारी प्यारी गौमाता
शायद अब किसी को भी गौमाता की फिक्र नहीँ
तभी तो किसी भी जुबां पर इस बात का जिक्र नहीँ
लाखों हैं दानी और धर्मी हैं इस संसार में
फ़िर भी गौमास बिक रहा है बाजार में
जहाँ भी देखो वहाँ पर खूनी खेल है
जायके की थाली में बीफ की रेलमपेल है
हाँ लगा था कुछ हो जाएगी अब सुनवाई
जब भी हमारे यहाँ चुनावी बारी आयी
मगर सत्ता के खेल कैसे हमने निराले देखे
सरेआम बटते गौमास के निवाले देखे
कुछ सरताजो ने उठाये भी थे क़दम इस समस्या के
जारी कर दिए थे फ़रमान रोकने को गौहत्या के
पर क्या करें, भ्रष्ट न्यायालय के पहरेदार हैं
अभव्यक्ति की आजादी के ये ठेकेदार हैं
हाँ शायद ऐसा भी हो सकता है
न्यायाधीश के मुँह में पैसा भी हो सकता है
तभी तो हमेशा पंचायत मुँह देखी होती है
दौलत की चाह में अन्याय की अनदेखी होती है
क्या-क्या कहूँ करतूतें कलयुगी इंसान की
कुकर्मों ने कुरूप कर दी है सूरत इस जहान की
कैसी अवाम दोगली आज के हिंदुस्तान की
गायों की है अनदेखी और फिक्र शक्तिमान की
हमको किसी और कौम पर तो भरोसा नहीँ
पर हिन्दुओं ने भी इसके लिए खुद को कोसा नहीँ
बदलते दौर में पुण्य का तरीका भी बदल गया
जिंदगी जीने का सलीका भी बदल गया
जिस घर से कभी आवाज़ धेनू की आती थी
हर सुबह गौ माँ के लिए सिकती चपाती थी
पर आज सुबह का कैसा आगाज है
गायों की रंभाट नहीँ कुत्तों की आवाज़ है
कुछ कहूँ तो ये तर्क सुनता हूँ
कानों से कुछ शब्दों के अर्क चुनता हूँ
गौपालन करने से घाटा हो जाता है
फ़िर भी मधुशाला से एक पैग आ जाता है
अब धर्म की बातें सोशल मीडिया पर ही होतीं हैं
मगर कुछ करने को सबकी आत्माएँ रोती हैं
‘गर्व से कहो हम हिंदू हैं’ सब चिल्लाते हैं
अनजाने में सही पर सब गौमास खाते हैं
लाखों देखी हैं संस्थाएँ गौपालन की
पर असलियत कुछ और ही इनके चलन और चालन की
हाँ सुना है हमने भी राजीव जी के बयानों को
मानव जीवन पर कुदरत के दिए एहसानो को
अमरीका ने भी गौमूत्र का पेटेंट लिया है
कैंसर की दवा के लिए अरजेंट लिया है
हमारे जिंदगी में गायों की कितनी महत्ता है
फ़िर भी क्यों मौन अदालत और ये सत्ता है
इन बेजुबानों पर इतना एहसान क्यों नहीँ करते
‘Save Tiger’ किया ‘Save Cow’ का जारी फ़रमान क्यों नहीँ करते
नही कर पाओ तो बस इतना ही रहने दो
अब मुझे भी तो अपने दिल की बात कहने दो
इनको अपने जख्म खुद ही सीने दो
खुद जियो चैन से पर इनको भी तो जीने दो
या फ़िर “आग” को इतना अधिकार दे दो
बस कसाइयों के लिए हाथों में हथियार दे दो
मैं खुद ही गौरक्षकों की फौज तैयार कर लूँगा
इनके लिए ही जी लूँगा इनके लिए ही मर लूँगा

कवि देवेन्द्र प्रताप सिंह “आग”
9675426080
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