रोज़ की कहानी

आज हुई है सुबह चमकती , दिल भी मेरा खुश था बड़ा
ताजा किरणों का झुरमुठ ले कर , निकली थी ये सुबह ज़रा

मैं भी सज कर , बन ठन कर , निकली घर से दफ्तर जाने को
लगा के चश्मा , पहन के साड़ी , दुनिया की मौज उड़ाने को

खड़ी सड़क पर सोच रही थी , कैसे स्टेशन तक पहुंचू
ऑटो से या रिक्शा से , किस साधन से में अब पहुंचो

फिर बस को देखा जिस पल मैंने , लहर ख़ुशी की दौड़ पड़ी
झटपट उस पर चढ़ कर ,सोचा जंग सुबह की जीत ही ली

बड़े जतन से , खींच खाच के बस के भीतर मेँ पहुंची
पहोंच के भीतर सोच रही थी , इस जंग में आखिर क्यों उत्तरी

पल भर का सफर किया जब , कुछ दूर ज़रा जब बस पहुंची
ख़राब बस को देख मेरी , तबियत ज़रा ज़रा बिगड़ी ………

सम्भाला खुद को मैंने , बड़े नाज़ो जतन कर के
दिल बेचारे ने सोचा , आखिर ये सुबह ही क्यों निकली ,

ऑटो ले कर स्टेशन पहुंची , बड़ी ही विकट थी परिस्थि
स्टेशन पर हूँ जान के दिल में ख़ुशी की लहर ज़रा दौड़ी

ट्रैन भी आई पल भर में , जैसे दिल को हो भाई
चढ़कर ट्रैन मे , मैंने सोचा इतने लोग है क्यों भाई

लोगो की जो भीड़ लगी थी ,हर डिब्बे में चढ़ने को
ये लो मुक्का , ये लो धक्का , हर शकस लगा था करने को

हम भी खड़े हुए थे , इन् धकखो की बारिश में
क्या करते आखिर हमको भी पहोचना था जल्दी दफ्तर

बड़ी ही मशकत, मेहनत करके आखिर पहुंची दफ्तर
सर चकयरा जब ये देखा , घडी ने ले लिया पूरा चकर

हुई हाज़िरी मेरी जम्म के , बड़े बाबू के दरबार में
फिर से हुई थी देरी मुझको , में बैठी मजधार मे

बैठी चेयर पर सोच रही थी , है क्या मज़ा इस जीने मे
आँखों मे सपने , दिल मे उमंगें , क्या खाक रहा है सीने में

फिर सोचा , ये जीवन पहिया रोज़ चलेगा रुक रुक कर
कभी ख़ुशी से , कभी नमी से जीवन की जओात चली हर पल

फिर निखरेगी सुबह मेरी , इस जीवन पथ पर बढ़ने को
फिर से शाम रंगी होंगी , वक़्त के बिस्तर पर सोने को

4 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 30/05/2016
    • tamanna tamanna 31/05/2016
  2. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 31/05/2016
    • tamanna tamanna 31/05/2016

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