धरती वंदना

धरती वंदना

हे मां, तेरी है शान निराली
आभा अद्भूत चमकत न्यारी ।
तेरे सारे पेड़ ये झूमें
हवा के शीतल झोंकों से
मन भी कंपित सा होकर
भरता पंछी बन उडारी ।
हे मां, तेरी है शान निराली
आभा अद्भूत चमकत न्यारी ।
स्पर्श अदृश्य कोमल सुगंधमय
हवा में सारंगी के तार की लय
झूम जाना चाहता हूं खूद
बातें भूलकर मैं सारी ।
हे मां, तेरी है शान निराली
आभा अद्भूत चमकत न्यारी ।
नैनों में एक दर्पण जैसे
हरियाली को खुद में समेटे
फू लों की सुगंध सांसों में भरके
झूम ये जाती है सारी ।
हे मां, तेरी है शान निराली
आभा अद्भूत चमकत न्यारी ।

2 Comments

  1. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 30/05/2016
  2. Dr Swati Gupta Dr Swati Gupta 30/05/2016

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