सांझ और सवेरा

सांझ और सवेरा

काली सांझ, उजला सवेरा
लेकर फि र से आ गई ,
आज की सुबह तो जैसे
मन को मेरे ही भा गई ।
आज का यह सुहाना दिन
मानो दिन, दिन न होकर
अजीब तोहफा है मेरे लिए
अरसों बाद मिला यह दिन
न जाऐगा जाम पिए बिन
भूला था मगर याद आ गई ।
आज की सुबह तो जैसे
मन को मेरे ही भा गई ।
हर मंजिल हर डगर पर
घुमता फि रता था मैं अकेला
जैसे पागलों की तरह
था मेरा जीवन अलबेला
मगर मुझे यह सांझ तो
नया जीवन दिला गई ।
आज की सुबह तो जैसे
मन को मेरे ही भा गई ।

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