खो गया है बचपन…

मेरी यह कविता आज के सामाजिक परिवेश मेँ बच्चोँ पर पढ़ाई व दिनचर्या से उत्पन्न दबाव के कारण उनके दिनोदिन खत्म होते बचपन पर आधारित है।मेरी यह कविता इस प्रकार है-

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कुछ कह रहा है मेरा मन
जाने क्या है उलझन
कुछ कह………।

जब देखता हूँ दर्पण
तो याद आता है बचपन
बचपन की अठखेलियाँ अनेक
पर मन स्वच्छ,निश्च्छल व नेक
तो क्योँ बदल गया मैँ अब प्रभु देख?
कुछ कह………।

जब देखता हूँ आँगन
तो खलता है सूनापन
वह दुआएँ,बढ़े-बूढ़ोँ का आर्शीवाद
छोटोँ से वह बेवजह वाद-विवाद
कहाँ गए वो पल एक सुनहरा सपना बन?
कुछ कह………।

जब देखता हूँ तस्वीरेँ
तो याद आता प्यार व अपनापन
वह घर के उत्सव-त्योहार
माता का लाड़ व पिता का प्यार
क्योँ ढल गया चाँदनी रात का उजाला बन?
कुछ कह………।

सोचता हूँ जब बैठकर
क्योँ है यह उलझन?
आता है ख्याल मन मेँ
कहीँ खो गया है बचपन
कहीँ खो गया है मेरा बचपन
आज कहीँ खो गया है बचपन………

3 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 29/05/2016
  2. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 29/05/2016

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