लिख दो

लिख दो
कि अब बूँदा बाँदी नहीं है
बादल सरकते नहीं
उड़ते हैं
बरसते नहीं, फटते हैं।
सूरज तापमान दिखाता है,
उँचा और ऊँचा।
विद्यालय के कंधे
हल्के हो गये हैं,
कोंचिंग की आदत
सर्पाकार हो चुकी है,
अंग्रेजी की धुंध में
कुछ दिखाई नहीं देता।
चिट्ठी आती नहीं
उत्सुकता बनती नहीं।
समय आता है
पर किसी और के लिये,
हाथ हमारे नहीं
किसी और के हैं,
कदम वे नहीं
अलग लगते हैं।
शहर का मिजाज
बदला-बदला है,
बरफ में हमारा हिस्सा नहीं
सड़क पर हमारी ताकत नहीं,
लेकिन शब्द तो भिनभिनाते हैं
पुस्तकालयों में,इन्टरनेट पर,
धरती पर हमारा हिस्सा है
आकाश में हमारे नक्षत्र हैं।
लिख दो
अभी धड़कता है दिल
पहले की तरह नहीं
आज की तरह , धीरे-धीरे,
कहता है बातें
पहले की नहीं, आज की,
इतने बर्षों में इतना इतिहास तो बनता है।
**महेश रौतेला

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