Poems

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‘‘¬’’

‘‘सौंधी महक’’

सौंधी महक को मैने प्यार भरी कविताओं से रिषतों की गरिमा से वेदना, भजनो और सूफी गजलों से महकाया है।

भावो के सुंदर मोतियों से इसे पिरोया है। हर एक मोती का रंग रूप अलग है पर सभी आपके मन को छू लेगे। ़ऊर्दू और हिन्दी का मिलन भी अनूठा हैं।

(उर्मिल कपूर)

‘‘¬’’
‘‘मेरा बेटा’’

चीरती अंधकार को उजली किरणे,
जग को भिगो रही थी।
घरा नवप्रभात को अपने आंचल में
वो संजो रही थी।
तभी नन्हे सदन ने एक मां को
गीली आंखो से हंसा दिया।
तन्हा जिंदगी में ममता और खुषीयो का
कारवां सजा दिया ।
सोचा था वह चिराग हमारे जीवन को
खुब जगमगायेगा ।
पर इसने तो प्रभु प्यार का दीया
हर तरफ जला दिया ।
खुषनसीब है हम माँ-बाप
जिसने ऐसा बेटा पाया ।
उसने हमारे घर को मन्दीर,
मस्जिद और गुरूद्वारा बनाया ।
घर-देष से निकल इस दीपक ने
विदेशो में ज्योति जलाई ।
एक नूर से सब जग उपजा
यही बात सबको समझाई ।
मन की गहराइयों से माँ-बाप का तुम्हे
आर्षीवाद है मेरे बच्चे ।
सुख, षांति, प्रेम और खुषीया मिले तुम्हे
मन के भाव है यह सच्चे ।

(उर्मिल कपूर)

‘‘प्रभु प्रेम’’

आनंद, प्रेम रूप है प्रभु तेरा
इसी रूप से मैं खुद को सजा लू ।
सांसो के साज पर हर वक्त
मैं तेरे ही गीत गुनगुना लू ।

करू कुछ ऐसा मेरे प्रियतम्
कि तेरे प्यार में खुद को मिटा दूं ।
हर षख्स मुझमे भी तुझी को देखे
मौहब्बत का कुछ ऐसा सिला दूं ।

दुनिया के दुःख सुख सबको भूला के
डूबकर तुझमे, जीवन नैया को इक मुकाम दूं ।
तेरी यादो को पिरो कर धड़कनों में
ए रब इस प्यार को इक नया नाम दूं ।

(उर्मिल कपूर)

‘‘पहला पृष्ठ’’

जिंदगी का हर पल, कुछ नया सिखाता है। अहसास करवाता है, उतार चढाव, खट्टा मीठा रिष्तो का स्वार, प्यार मौहब्बत का उन्माद और भगवान की तरफ झुकाव सुफो अन्दाज सभी मैने भी चखे और उनकी पन्नो में उडेल दिया ।

मेरा भावुक मन उन अहसासों की रूह तक भीगो देता हैं और हाथ हाथ कलम पकड़ कर उन्हे षब्दों का रूप देते हैं । यह जज्बात सिर्फ मेरे ही नही है आप सबके हैं । सभी इस जिंदगी की खुबसूरत बगिया में तंग गलियों से बहुत सारी मुष्किलों और दर्द से गुजर कर आते है। मुझे पूरी उम्मीद है कि आपको बहूत पसंद हि आयेगा ।

(उर्मिल कपूर)

‘‘मेरा ख्याब’’

सभी के लबो की हंसी बनके मै खिलू,
हर इक को गले लगा के मैं मिलू,
चलत राह गुजारो में बॉटते हुए प्यार,
मिले दर्द दिल तो उसे पलको से पी लू ।

अंधेरी रात का दीया बन जलू मैं,
लड़खड़ाते कदमो का सहारा बन चलू मैं
दे हिम्मत मुझे मेरे ओ परवरदिगार,
तेरी हर रजा अपने माथे पे सजा लूं मैं ।

किसी का आंख का आंसु न बनके टपकू,
दिल में किसीके न दर्द बनके धड़कू,
ख्यालों जब भी मैं आऊं, मुस्कुराहटे वो होठ,
यही तमन्ना है यही इब्बादत मेरी अे मेरे गोठ ।

(उर्मिल कपूर)

‘‘मेरा साजन’’

मेरे जीवन का हर लम्हा है खिलता सावन,
तेरे प्यार की खुषबू से महका है मेरा दामन ।

कभी पड़ी फूहारे, नौक-झौक की,
कभी गिरी, बिजलियाँ बिन रोक-टोक की ।

बरसा प्यार फिर मनाने को अपना साजन,
तेरे प्यार की खुषबू से महका है मेरा दामन ।

उड़़ो वहाँ जहाँ बस मेरी हवा हो,
ढले उमर मगर तुम सदा जंवा रहे ।

भीगा रहे तेरे सरूर से हमेषा मेरा यह मन,
तेरे प्यार की खुषबू से महका है मेरा दामन ।

दो हसी फूल जो तुमने मुझे दिये,
मेरा जीवन न्योछावर अब उनके लिए ।

अब उनसे ही फलफूल रहा मेरा यह उपवन,
तेरे प्यार की खुषबू से महका है मेरा दामन ।

(उर्मिल कपूर)

‘‘बून्दे’’

सुरमई रात के अन्धेरे में, फुटती रोषनी के साये में,
आंगन में थिरकते, मोतियो को देखा मैने ।
छमछम बारीष की ताल पे, बुन्दों को नाचते देखा मैंने ।

चमकती बुंदो पर, चाँदनी का षबाब था ।
कुदरत ने दिया खूबसुरत सा लिबास था ।

काले भूरे बादल थे आकाष को घेरे,
उससे मिलने बिजली काट रही थी फेरे ।

मधुर मिलन की गडगडाहट लो सुना सबने,
इक दूजे मे खोने के ख्याब को चूना रब ने

नन्ही बूंदो को मैंने, हथेली पे ले चूमा,
जहन में अजीब सा, मदमस्त नषा झूमा ।

झूमते नषे में हो गया उजला सा सवेरा,
रह गये उनके निषा, चला गया अंधेरा ।

(उर्मिल कपूर)

‘‘ माँ ’’

कहते हैं लोग, बहारों में खिले फूल हंसी है,
पहली बारिष की नन्ही बूंदो में खुषियां भी हैं ।

खूबसूरत यह चांद सितारे यह जीम है,
कूदरत की किसी भी रौ में, कोई नहीं की है ।

सब से दिलकष, खुदा का चेहरा नूरानी है,
उसके आगे किसी की तारीफ बेमानी है।

पर कहती है उर्मिल की, सब सुन्दर चेहरा है माँ का,
जिस गोद में हो टुकड़ा उस की जां का ।

उसके होंटों की मुस्कूराहटें, फूलों को षर्मिन्दा कर दें ।
देख पाकीजगी उस की, खुदा भी उस को सजदा कर दे ।

माँ के आगे जन्नत का जलवा कुछ भी नहीं है,
बाँहों में हो बच्चा मां के, ये नज़ारा सबसे हसीन है ।

(उर्मिल कपूर)

‘‘बेटी’’

मेरा रूप है तू मेरे आंचल की नाजूक कली,
ममता प्यार तमाम दुआए लेकर तू पली ।

आँगन के साथ जीवन भी महका जब तू आई,
चाँद-सितारों ने मदमस्त बहारों ने दी मुझे बधाई ।

भाई की सजी कलाई, बाबूल की खुषी मुस्कराई,
बेटी पाकर, मैंने मुंह मागी मुरादे पाई ।

बचपन से जवानी तक अपनी तस्वीर देखी तुझमे,
कभी माँ, कभी बेटी, कभी अंतरंग सखी देखी तूझमें ।

तू अनमोल भेट है जो बख्षी रब ने,
तूने जो कर दिखाया उसको सरहाया सबने ।

खुषनसीब है माँ जिसने बेटी को जाया,
अनजानी खुषी से मरहूम रहे सिने न इसको पाया ।

हमारी दुआ है, अपने प्यार के संग खुषी से सदा खिलखिलाये,
माथे पे बिन्दिया आंखो में नूर सदर झिलमिलाये-झिलमिलाये ।

(उर्मिल कपूर)

‘‘महबूब’’

मायने अब करीबी के बदल गये है,
हालात जिंदगी के अब सम्भल गये है,
जिस्म पास हो जरूरी नही नजदिकियों में,
दूरिया खत्म हो जाती है, सोच की बारकियों में ।

सात समुन्दरो का चाहे हो, बीच मे फासला,
अहसासे प्यार में तुम मेरे हो, यही होता है हौसला ।

सदा रहते हो ख्यालो में, ख्याबो मे भी तुम हो,
जिंदगी की खट्ठी-मीट्ठी यादां में भी तुम हो,
आइने में देखू तो, मांथे पर तुम हो,
बिखरी जुल्फों में मुस्कूराते से तुम हो ।

तुम दूर रह कर भी रूहबरूह मेरे सामने हों,
तुम मेहबूब हो मेरे, या प्यार के मायने हो ।

प्यार कितना करते है हम, काष तुम समझ पाते,
सुखे हुए होठों पर, गुलाब बन हम खिल जाते,
वक्त की नजाकत को, अब हम समझ गये हैं,
मायने करीबी के मेरे महबूब, हम समझ गये है ।

(उर्मिल कपूर)

‘‘दोस्त’’

वह दोस्त जो बहुत अजीज थे,
दिल के बहुत करीब थे ।

हमारी महफिल की जान थे वे,
झलकते हुए मदमाते जाम थे वे,
हमारे होठो की हँसी की लकीर पें,
दिलों की जान, कुर्बान थे वे ।

सुबह षाम हमारी उनके दम से थी,
उनकी दुनिया, जिंदगी बस हमसे थी ।

बात कुछ ऐसी बनी,
दुखः की बदलिया हुई घनी

रोषनी के दीये जब बुझ गये,
गमो के पहाड़ हम पर झुक गये ।

कह कहो की जगह आंसु सहारा बन गये ।
अजीज दोस्त त. हमसे किनारा कर गये ।

(उर्मिल कपूर)

‘‘जीवन’’

रेत सा खिसकता जा रहा है, मुठ्ठी से जीवन
बस हाथ मे रह गये है, कुछ ही पल ओ मेरे मन ।

इस पल को इतना हसीन बनादे कि नजारे देखे,
इतना पवित्र बना दे कि मन्दिर, मस्जिद, गुरूद्वारे देखे ।

इसको बड़ा इतना बना दे कि धरती, गगन देखे,
अद्भुत इतना बना दे कि खुद भगवान देखे ।

पल पल चुन कर बना ले फिर पूरा जीवन,
मानवता को करे अर्पणा, इसको ओ मेरे मन ।

(उर्मिल कपूर)

‘‘ परेषा जिंदगी ’’

जिंदगी यह बता तू मुझसे नाराज है क्यू,
तन्हाइयों मे तेरी सिसकियों की आजाव है क्यू,
मै चाहता हूॅ तुझे हर पल, फिर तू गमसार है क्यू,
आंखे चूराती है मुझसे, इतनी षर्मसार है क्यू ।

तेरे हसी चेहरे को संवारू, मैं अपने खूने जीगर से,
तेरे साथ चलू मै, हर ऊँची-नीची डगर पें,
ख्याब फूलों के दिखाकर कांटो से उलझाती है क्यू,
मुझे होठों की मुस्कराहटो के लिए तरसाती है क्यू ।

जिंदगी यह बात तू ……………………….

मेरे आंखो की नमी तेरा ज्वार है,
सांसो की घुटन की वजह तेरा खुमार है,
तेरे को इतना चाहना, मेरी जिंदगी यह खता क्यू है,
मैं करू वफा हर दम, तू इतनी बेवफा बता क्यू है।

जिंदगी यह बात तू ……………………….

(उर्मिल कपूर)

‘‘ जिंदगी ’’

जिंदगी जी कर तुझे, हम दिखा देगे ।
दुःखो के ढेर से खुषीयों को हम तलाषेगे ।

चुभन जो दी जमाने ने, बेइन्तिहा दिलो दिमाग पे,
दर्द जितना भी हो, सह सह कर हम दिखा देगे ।
दुःखो ……………

तेरे दामन मे काँटे ही सही ए चमन,
फूल सहरा खिला कर हम दिखा देगे ।
दुःखो ……………

हर कदम पे जख्म जो दिये तुमने हमको,
सब्र के धागो से सीकर हम दिखा देगे ।
दुःखो ……………

राहे मुष्किल हैं मुष्किल ही रहेगी उर्मिल,
घबरा नही, हालात को हारना हम सिखा देगे
दुःखो के ढेर से खुषीयों को हम तलाषेगे ।

(उर्मिल कपूर)

‘‘ इष्क ’’

लुफ्त लेना है जो जिंदगी का,
इष्क से दोस्ती कर ले,
जुस्तजु ना कर, चाँद सितारां की,
छोटी छोटी खुषीयां मुट्ठी में भर ले।
लुफ्त लेना………………

अपने बेगानों की मिटाके दूरिया,
छोटे बडे़ सभी की बंदगी कर ले ।
लुफ्त लेना………………

छोड़ कर दौलत के चन्द सिक्को का मोह
रब की खुबसुरत न्यामतो से झोली भर ले ।
लुफ्त लेना………………

अपने हिस्सो की खुषीया को बांट कर ए दोस्त
मन की खुषीया को कई गुना कर ले ।
लुफ्त लेना………………

(उर्मिल कपूर)

‘‘ मौहब्बत ’’

मौहब्बत जज्बा है दिल का, धडकनों से एहसास कीजिए,
खामोष रहने दो होठां को, नजरों से बया कीजिए ।

खुबसूरत फूल है इष्क, छूने का न इल्जाम कीजिए ।
टूट कर बिखर जायेगा यह,
सांसो को दूर से महका लिजिए ।

नूर की बूंद है मौहब्बत, मस्ती के आलम में पिया कीजिए ।
नजरों मे भर के माषूक को, सुबह षाम इसकी इबादत कीजिए ।

जबाब

एहसास तुमने जगाये है प्यार के,
पहरे क्यों बैठा दिये इजहार पे ।

खामोष मौहब्बत को आवाज देने दो,
धड़कते दिल को षब्दों के साज देने दो,
अपने रूखसार को हल्के से छू लेने दो,
नजदीकियो के नषे में थोड़ा सा झूम लेने दो ।

कसम खुदा की मैला न होने देगे,
रूसवा न तुमको जहाँ में होने देगे ।

मेरी दिवानगी का ना लो तुम इम्तिहान,
मौहब्बत के दम से है खुषगवार यह जहानं ।
चाहना गर खता है, तो यह खता होने दो,
मेरी खामोष मौहब्बत को आवाज देने दो ।

(उर्मिल कपूर)

‘‘ अफसाना ’’

मौहब्बत गर कहने से हो जाये,
हर षख्स दीवाना हो जाये ।

यह लफ़्ज नही बस बया करने का,
अफसाना है खूनी जिगर से भरने का ।

दिल अगर किसी से मिल जाये,
इन्सा खुद से बैगाना हो जाये ।

उनसे मिलने और बिछड़ने का गम भारी है,
हर तरफ उलझने, हर वक्त बेकरारी है,
राहे वफा आसा हो जाये,
हर षख्स दीवाना ……………

बिन उनके राते सूनी और दिन अंधेरे लगे,
उनीदी आँखे सपने देखे जगे – जगे,
जिस्म अपना हो, दिल और धड़कने वो बन जाये ।
हर षख्स दीवाना ……………

(उर्मिल कपूर)

‘‘ प्यार ’’

तुम्हारे प्यार में बहुत ऊपर उठ गये,
लगता है बादलों में उड़ रहे ।

यहॉ से जमीं दिखती नही,
बन्दिषो की जंजीर कही नही,
मौसम यहां का कभी बदलता नही,
चक्कर धरती का यहां चलता नही ।

प्यार की ठंडक है हर कही,
लोंगो की जलती नजरे कही नही,
फूल खिलते नही बस बहारों में,
हर वक्त बिछे रहते है राहों मे ।

आओ प्यार में तुम मेरे साथ हो जाओ,
जिस्म से परे रूहानियत में खो जाओ ।

डूबकर प्यार में हम खुदा को पालेगें,
मंजिल का पता गुजरे कदमों के निषा देगें ।

षिकवा नहीं किसी से जो हमसे रूठ गये,
तुम्हारे प्यार में हम बहुत ऊपर उठ गये ।

(उर्मिल कपूर)

‘‘ दीदार ’’

नजरे मिली भी नहीं कि दीदार हो गया ।
ना जाने कैसे प्यार, मेरे यार हो गया ।

उनके आने की खबर, महकीं हवाओ ने दी,
आहट सुनी भी नही कि, दिल बेकरार हो गया ।
नजरे ………………..

चर्चे उनके हुस्न के सुने लोगो की जुबां,
सितारों, बहारों का षबाब यहाँ बेकार हो गया ।
नजरे ………………..

बैठे सामने वे, अक्स उभरा पैमाने में,
बिन पिये ही नषा, बेषुमार हो गया ।
नजरे ………………..

धड़कते दिल से नजरे जो उठी दीदार को,
खुदा की हसी न्यामत का खुमार हो गया
नजरे ………………..

(उर्मिल कपूर)

‘‘ जनाजा ’’

मेरी बरबाद मौहब्बत का जनाजा लेकर,
अपने दामन को क्यों दागदार करते हो ।

घुट-घुटकर मर गये, तेरी मौहब्बत के खातीर,
न दे सके तुम, क्यों फिर गमसार लगते है।
मेरी अपने ………………

तुम्हारे तसल्लियों के लफ्ज नषतर से चुभते है,
खुने जिगर कर, मासूम से क्यों राजदार बनते हो ।
वे अपने ………………

मुझसे कई टूटे दिल मिल जायेगे जमाने में,
नजरे झुकाये मेरे हालात पर क्यों षर्मसार लगते है ।
अपने ………………

भूल जाओ कि मेरे आँसूओं को ताबीर तुम दो,
बेख्याली से हुआ सब, क्यों तुम गुनहगार लगते हो,
अपने ………………

(उर्मिल कपूर)

‘‘ रूहानी प्यार ’’

दो नजरों का एक दूजे में खोना प्यार है,
दो जानों का एक जान होना प्यार है ।
चाँद-सितारों से गुल बहारों से छिपकर,
रात ढले दो इन्सानों का मिलना प्यार है।

पर कहती है उर्मिल, दो नजरों का एक तरफ देखना,
दो दिलों का एक लय पर धड़कना प्यार है ।

नषा एक की नजर का, तारी हो दूजे पर,
गीत आषीक के, माषूक का गुनगुना प्यार है ।

जिस्म पास हो जरूरी नही नजदीकियों में
दूर रह कर भी छूने का अहसास प्यार हैं ।

रिष्ते नातों का महज दिखावा न हो तो भला,
दो अजनबियों का एक राह चलना प्यार है ।

(उर्मिल कपूर)

‘‘ महक ’’

अक्स तेरा मेरी नजरों में कोई देख न ले,
लोंगो से नजरे छिपाये फिरते है।
मेरी मौहब्बत की महक, जहाँ ले न ले,
फूलों सी दिल में छिपाये फिरते हैं ।

किससे मांगू और कहां मागू तुमको,
खुदा को खुद में छिपाये फिरते है ।
इश्क और अष्क में अजब सा रिष्ता है।
एक होता है तो दूसरा दिखता है ।

महबूब का दर्द आषीक के सीने से रिसता है ।
यू तो मौहब्बत के बहूत से अफसाने है ।
पर हम तो खुद ही अफसाना बने फिरते है ।

पतझड़ के मौसम में बहार नजर आती हैं ।
गर्द भी हवाओं में तेरी जुल्फों की महक आती है ।
जब तुमने दबे होठों से, प्यार का इजहार किया ।
उसी लम्हे को सीने से लगाये फिरते है ।

(उर्मिल कपूर)

‘‘ बेबसी ’’

इजहारे मौहब्बत किसी काम न आई,
बैठे वो पास हमारे, ऐसी कोई षाम न आई ।

उल्फत के जाम घूट-घूट पिये,
रात ऐसी कोई मेहरबान न आई ।
बैठे वो …………

उनकी नजरो में अक्स हमारा भी उभरे,
कोषीषे हमारी ऐसी तमाम न आई
बैठे वो …………

प्यार से न सही वैसे ही सही,
कोई आवाज हमारे नाम न आई
बैठे वो …………

आरजू तो बहुत खास थी हमारी,
हिस्से बाते भी आम न आई,
बैठे वो …………

(उर्मिल कपूर)

‘‘ जवानी ’’

बहती है झरनों सी, रूपहैली किरनों सी,
पतझड़ में बहारों सी, खुषनुमां नजारों सी ।

लगती हैं परियों की कहानी,
यही होती है मस्त जवानी ।

हवा को लगता है, पहना दे घूंघरू,
हसीन ख्याबों को कर ले रूहबरू ।

जमीं को समेट कर मुट्ठी में भर ले,
आसमां को अपने पाँव तले घर ले ।

यह खुषबू, यह बहोर, हमारे दम से है,
हुस्नों इष्क दूनिया सिरफ हमसे है ।

यह दिलकष दिन, यह राते सदा रहेगी ।
चलो न सही, पर यह यादे तो साथ रहेगी।

(उर्मिल कपूर)

‘‘ बुढ़ापा ’’

जिंदगी तमाम हुई जाती हैं,
आरजॅूए हजार हुई जाती है ।

सहर के इन्तजार में,
षमायें परवान हुई जाती है।

खुदा से मिलने को बेताब है रूह,
पर यह ख्वायिषे दीवार हुई जाती है।

उमर की सिलवटों ने किया बेरंग हमे,
और यह हसरतें जवान हुई जाती है।

लम्हा-लम्हा जिया है जिंदगी का इन्सा,
फिर मौत क्यों दुष्वार हुई जाती है ।

(उर्मिल कपूर)

‘‘ नारी षक्ति ’’

लो फिर टूटा दिल किसी का,
रोया आसमां, भीगा आंचल जमीं का ।

जब किसी बेटी का जिस्म लहूलहान हुआ,
हवस के आगे, आत्मा की चीखों ने दिलों को छुआ ।

एक-एक कतरा खुन ने कही दरन्दिगी की कहानी,
नारी के दर्द को सुना सबने आँसुओं की जुबानी ।

अब नारी देगी जबाब बेहद ही सख्ती से,
दुनिया को पहचान करायेगी नारी षक्ति से ।

खुद वो लेगी दरिन्दों से अपना बदला,
बहादूर नारी दुनिया में लायेगी नया जलजला ।

नही ताकेगी दूसरों की तरफ मदद के लिए,
दूसरों के संग वह जियेगे अब अपने लिए ।

(उर्मिल कपूर)

‘‘ दर्द ’’

गीली आँखो से बह नही पाते,
दर्द इतना है कि हम सह नही पाते ।

न तुमसे षिकवा है, न खुद से गिला,
पर हालात कुछ ऐसे है कि खुष रह नही पाते ।

तुम्हारे दिए जख्मों को सहलाते रहे फूलों के मानिद,
तीखी-तीखी चुभन सहते रहे हम रात और दिन,
रोना चाह कर भी हम से नही पाते ।

तुम्हारी याद एक पल भी भूला नही पाते,
गीली ………………………….

(उर्मिल कपूर)

‘‘ गम ’’

गम के बादल जब घने होते है,
दिल के सारे भाव अनमने से होते है,
आँखों से जब बदलियां बरसती है,
खुषीयां न जाने क्यू दूर खडी हंसती है ।

मन चाहता है, दो हाथ सर पर हो,
वह चाहे बेगानें हो या अपनों के हो,
गालों की तकीरों को कोई पोछ दे,
दुःखो की परतो को कोई खरोच दे ।

खुदा ही ऐसे में आखीरी सहारा होता है ।
बहते तुफा में वो ही किनारा होता है,
उसके दामन को कसके पकड़ लेता है मन,
मिट जाती है सब चिंता और सभी उलझन ।

गम के बादलों से अब रहमते बरसती हैं ।
खुषीयां हर तरफ खड़ी खिलखिलाती हैं ।

(उर्मिल कपूर)

‘‘ तड़प ’’

बाद मुद्दत के बड़ी मुष्किल से सम्भला है दिल,
मिलना है तो बस ख्याबों में आकर मिल ।

रूहबरूह मिलाना मेरे लिए मुहाल होता है ।
कशीष तेरे चेहरे की देख हाल बेहाल होता है ।

झुकी-झुकी नजरों के वार दिल के पार होते है,
दबे-दबे होठों की कसक देख जार-जार रोते है।

अहिस्ता से ही मगर कभी तो जख्मी को सिल,
दर्द को दबा कर खुषी से कभी तो मिल ।

(उर्मिल कपूर)

‘‘ कतरे ए गम ’’

कुछ कतरे जो गम के मिले हमें,
दरिया समझ डूबते उतरते गये ।

कभी लहरों को कभी साहिल को तलाष्ते रहें,
सकुन के वास्ते हर पल हम तरसते रहें ।

देखे जो जहाँ के गमों को हम हो गये परेषा,
गर गम यह है तो जो हमे मिले वो था क्या ।

षायद वो थी उनकी परछाई,
दर्द की दास्तां सुनानी थी वह आई ।

हाल पर अपने षर्मसार होने लगे,
भूलकर दुःख अपने दूसरो में खोने लगे ।

उनके अष्कों से दिल अपना भरने लगे,
जिदंगी में अब कांटो की जगह फूल झरने लगे ।

गम के कतरों ने हमें क्या से क्या बना दिया ।
गर गम मिले होते तो ए खुदा हमें इन्सान बना दिया होता ।

(उर्मिल कपूर)

‘‘ तन्हाई ’’

परेशा परेषा सा घूमता हूँ, तन्हाई ढूंढता हूँ,
फूलों से पूछा, कांटो ने बतलाया ।

ढूढ़ो उसको वहां, झरने बहते हो जहां ।
चारां तरफ पहाड़िया हों, दूर दूर तक विरानिया हो ।
उदास-उदास सी हवाएं हो, फिजा में खामोषियों के साये हों ।

मैने वही उनको तलाषा, वहां तो कुछ और ही था तमाषा ।
छोटे-बड़े लोगो का वहां मेला था ।
षहर की भीड़ ने जैसे उन्हे ढकेला था ।

हर षक्स परेषान था, हाथें में उनके जाम था ।
होठों पे दर्द का पैगाम था, आँखों में सर्द सा सैलाब था ।

षायद उनकी भी उन्हाई की तलाष हो,
न मिलने पर थके हारे और हताष हो,
मैं हार कर अपने घर आया, अपनी चौखट पर उसे पाया ।
देख पहले वह खिलखिलाई, फिर रूकी नहीं उसकी रूलाई ।

वह मुझ जैसी परेषान थी, षायद मुझसे ज्यादा उदास थी।
गले लगा कर अपने घर लाया, एक वफादार साथी मैने पाया।

हर जख्म दिखाता हूँ, हर गम बताता हूँ ।
वह धीरे से सहलाती है, उन पर मलहम लगाती है ।

जब भी मै अकेला होता हूँ, वह चुपके से आती है ।
मरी सब सुनती सहती है, पर अपनी नही कुछ कहती है ।

अब मैं और मेरी तन्हाई है,
मैं इष्क और वो मेरी आषीकाई है ।

(उर्मिल कपूर)

‘‘ इन्तजार ’’

कब तक इन्तजार के सलीव पर लटकेंगे जवाब दोगे तुम,
सफेद चादरों की सिलवटो का हिसाब दोगे तुम ।

तारों को गिनते हुए टूटने का सबब था क्या,
सर्द रातों को नंगे पाँव चलने का षगल था क्या ।

जँँवा हसरतों का परवान न चढ़पे में खलल था क्या ।
इन तमाम सवालात का जवाब दोगे तुम
कब तक ……………………….

हमारे अरमानों को कुचलने में हाथ था किसका,
बोझिल पल क्यों कई युगो सा खिसका ।

एक-एक आंसू क्यों बार-बार सिसका
इन सिसकते हुए लम्हात जबाब दोगे तुम ।
कब तक …………………………….

(उर्मिल कपूर)

‘‘ जाम ’’

मुश्किल तो होगी पर ए मेरे साकी,
पिला दो सागर को प्यास अभी है बाकी ।

कतरा-कतरा बरसी मय षबाब की,
जितनी भी जी बड़ गई तलखियाँ जा की ।
मुष्किल …………………………

आँखो में भर लू मिला हूँ जमाने के बाद,
बाते चाहे थी वह कल षाम की ।
मुष्किल …………………..

पूछो न हाल बेहाल का बे मतलब है,
निगाहां से कहो, कुछ बाते काम की ।
मुष्किल ………………………

(उर्मिल कपूर)

‘‘ इल्तजा ’’

रूठो न सनम कुछ इस कदर,
कि मौत दस्तखत दे दरवाजे पर,

माना कि रजिंषे थी अपने दरमियां,
कुछ हूस्न में, कुछ इष्क मे, थी खामियां ।
भूलकर मुस्करा तो दो जरा इधर ।
रूठो ना ……………….

शिकायत का कभी, न देगे हम मौका,
तपते मौसम में बन जायेगे बर्फीला झौका ।
दे देगे जान, तुम इषारा तो करो मगर
रूठो ना ……………….

झुक गये तेरे कदमो पे प्यार के खातिर,
लगा लो सीने से मौहब्बत रूसवा न हो फिर,
मेरी जुल्फों को महका दो, अपनी सांसो की हवा
रूठो ना ……………….

(उर्मिल कपूर)

‘‘ महकँदा ’’

झूमते निकलते है, महंकदा से सभी,
निकला हूँ झूमते हुए तेरे कूंचे से अभी ।

तेरी आंखो का जाम घूट-घूट पिया,
एक-एक पल नषे में मैं जिया,
होगा न खत्म यह सिलसिला कभी ।
झूमते ………………..

लबो से तेरे मय टपके एैसे,
सुबह में बरसे षबनम जैसे,
षबनम हो या षराब तुम ओ मॅहजबी ।
झूमते ………………..

छू के दामन तेरा, मदहोष मैं हो गया,
छू लेता जो तुमको तो क्या होता या खुदा,
पूरी हुई हर तमन्ना मेरी दबी-दबी ।
झूमते ………………..

(उर्मिल कपूर)

‘‘ आदाएँ ’’

साजो समान बहुत लाये थे, वो हमारी मौत के लिए,
कफन से हवा कर रहे, हमारे होष के लिए ।

आदांए कातिल इतनी कि सॉसे रूक जाये,
पलको का उठना फिर गिरना काफी है,
जज्बाते जोष के लिए ।
कफन ……………

अधखिले होठों से मुस्करा रहे अहिस्ता से,
तड़प के रह गये जज्बात आगोष के लिए ।
कफन ……………

आवाज है कि सांज पर नगमे कोई गाये,
फरियाद करते है हवाओं से, खामोंष के लिए ।
कफन ……………….

वह चले फिर रूके वक्त थम गया जैसे,
उनका बैठना जहेनसीब बहुत है मदहोष के लिए ।
कफन …………………

(उर्मिल कपूर)

‘‘ षिकायत ’’

तुम न आये गमों का कॉरवा लो आ गया,
हर लम्हा तुम्हारी बेवफाई समझा वो गया ।

आने की उम्मीद से पलकों से बुहारे बैठी थी रास्ता,
जाता हर पल उम्मींदो को दबे पाव घो वो गया ।
तुम ना …………………..

कितनी बार मुस्कराये अपनी बेबसी, पर तुम्हारे न आने पर ।
अष्कों का सैलाब अबकी बार कहर बरसा गया ।
तुम ना ……………………

क्यो किये वायदे, कसमों की चादर ओढ़कर,
हर वायदे में जैसे इकरार का वजूद खो गया ।
तुम ना …………..

चोखट पर जलाया था चिराग अरमानों का हमने,
हमारी किस्मत के साथ वो भी आखीर सो गया ।
तुम ना ………………….

(उर्मिल कपूर)

‘‘ गुजारिष ’’

प्यार को खुदगर्जी का लिबास न समझे,
आंखो की मस्ती को कुछ, पाने की आस न समझे ।
मौहब्बत का दरिया है, हर किसी के लिए,
सभी अपने है, रिषतों को खास न समझे ।

प्यार को ……………….

खुलापन, तग गलियों में सिकुडता है,
धरती गगन बीच, फूलों सा खिलता है।
ठहरा पानी, बंधी सोचे बू देती है,
फैलाव दो इन्हे, जकडन को पास न समझे ।

प्यार को ……………….

दूसरों का दिल दूखाते, तोडते है हम सभी,
खुषी का सबब गर बन जाये कभी,
उपर उठ जाये खुदा की नजरों में,
खूब पिलाये जाये इष्क पर प्यास न समझे

प्यार को ……………….

(उर्मिल कपूर)

‘‘ सासाँ दर्द ’’

चल कर साथ जो अलग हो गये किसी मोड़ पर,
ढूंढने से न मिले, चले गये जो हमे छोड़ कर ।

मिले तो पूछु कि कैसे हो बिन हमारे,
याद आती है या खुष हो मुँह मोड़ कर ।
चल …………….

रिष्ते नाते जो बन्धे थे साथ तुम्हारे,
झटक के कैसे चले गये तुम उनको तोड़कर ।
चल …………….

वह जगह जो खाली कर गये थे तुम जिंदगी में,
भर दी हमने टीसो और आंसुओं को जोड़कर,
चल …………….

जाने वाले काष, तुम पलट कर देखते,
इंतजार में खड़ी है, मै आज भी उसी मोड़ पर ।
चल …………….

तेरी छाया भी गर मुझे मिल जाये कभी,
पकड़ लू प्रिय मैं उसे दौंड कर,
चल ……………….

(उर्मिल कपूर)

‘‘ अहसास ’’

तेरे नाम से जुड़ा नाम मेरा कितनी तसल्ली दे गया ।
तन्हाइयों में भी तेरे होने का अहसास दे गया ।

सुखे पत्तों की तरह बिखर गये थे हम,
नम झोके से हमें ठहराव दे गया ।
तेरे …………………..

गर प्यार, इबादत से पाक है कुछ,
वह करते है, तुम्हे नन्हा पल हमें समझा गया ।
तेरे …………….

कोई अपनों के बीच तन्हा होता है कैसे,
रिष्तों का दर्द हमें यह बतला गया ।
तेरे ……………….

अकेले जिंदगी के मझदार में डूब रहे थे हम,
तत्सुवर में मुस्कराता तेरा चेहरा हौसला दे गया ।
तेरे …………………….

(उर्मिल कपूर)

‘‘ मजार ’’

तेरे बगैर जिंदगी, ए खुदा इक मजार है,
तू नही तो मेरा जीना बेकार है ।

हर तरफ तेरा बोल बाला हैं, तू बोलता क्यू नहीं,
मैं तेरा ही बच्चा हूँ, मेरी सुनता क्यू नही ।

हर सांस में अब तेरा ही इन्तजार है
तेरे बगैर जिंदगी ………………

दुःख सूख का साथी है मेरा, पर कोई एहसान नही,
तुझ सा मेरे खुदा, कोई और मेहरबान नही,
तेरा दीदार ही बस मेरे दिल का करार है ।
तेरे बगैर …………………..

तेरा नाम ही देता है जीने का हौसला,
कट रही है जिंदगी पर कटता नही फासला,
अ. आजा मेरे अल्ला मेरा मरना भी दुषवार है ।
तेरे ………………………

(उर्मिल कपूर)

‘‘ पुकार ’’

ना मैं मन्दिर में, न मस्जिद में, ना गुरूद्वारे,
मैं बैठा आँखो बीच, दोंनो बाहे पसारे,
आओ मेरे मीठे बच्चे यह पिता तुम्हे पुकारे,
ना भटको इधर-उधर खोलो मन के द्वारे ।

ना मै …………………

ना मै चाहू तीर्थ, व्रत न चाहू स्नान,
ना मै चाहू भूखे पेट, घूमो चारो धाम,
बैठ बन्दे षान्ती से, बस कर मेरा ध्यान,
देख अद्भूत, मेरी दूनिया के नजारे ।

ना मै …………………..

कब आओंगे मेरे प्यारो, कब से तुम्हे पुकारू,
तुम चलो, एक कदम मै दौडा चला आऊं,
पकड़ कर तुम्हें, बाहो से घर अपने ले आऊं,
मेरी सारी दौलते, सारी न्यामते,
रहमते कर दू नाम तुम्हारे ।

ना मै ……………………

(उर्मिल कपूर)

‘‘ फरियाद ’’

बेबस हो जाता है, बन्दा उसके फैसले के बाद,
नहीं काम आती मिन्नते, न कोई फरियाद ।

मांगा न था मैंने उनसे, जो वो न दे पाये,
झोली मे थी, उसके मुरादे बेहिसाब ।

चाहा न भंडार सुखो का, न थी दौलत की दरकार,
आरजू थी जी सकू खुषी से, रहू न कभी मोहताज ।

गिडगिडीया अपनी किस्मत पर, मै कई बार,
इल्जाम दिए खुदा को क्यो, हुई मेरी जिंदगी बरबाद ।

हर आवाज पर, मुस्करा दिया मौला,
बंद कर दी चन्द पलटने पर, मेरी करमो कि किताब ।

मेरे न चाहने पर सहते ही दुःख, दर्द, मुषकिले,
ए बन्दे, करम करने से पहले कर लेते मुझे याद ।

(उर्मिल कपूर)

‘‘ जल्वा ’’

ख्यालों में तुम्हारे आने से, खुषबू सी आने लगी है ।
रूह में बसी महक, सारी फिजायें महकाने लगी है ।

नूरानी चेहरे का तस्बूर में मुस्कराना भगवन,
खुमारी से भरी नजरें,
तुम्हारे कदमों पे, झुक जाने लगी है ।

सबके लबो पे नाम था, मेरे हुजूर का,
धड़कने मेरे दिल की,
तम्हारे नाम की धुन बजाने लगी है ।

तुम आओ, तो चूम लू,
उस जमीं को, जहां तुम्हारे कदम पड़े ।
चाहते दीदारे रब की,
हर वक्त मुझे अब, सताने लगी है ।

करके मेहर डालो नजरे इनायत, मुझ नाचीज पे,
जैसी भी है अब, तुम्हारी है उर्मिल,
इसी बात पर इतराने लगीं है ।

(उर्मिल कपूर)

‘‘ इबादत ’’

इबादत की ए खुदा, तेरी मैने चारों वक्त,
भूखा रहा तेरे लिए, मैं वक्त बेवक्त,
लुटाई दौलते तेरे बंदो पर, मैने कई बार,
पर लगता है खुदा, तेरे उसुल है बडे सख्त ।
इबादत ……………..

चाह कर भी न, तू मिला, न न्यातमे तेरी,
न रूह का करार मिला, न नजरे इनायत तेरी,
भटक रहा हूँ, पकड हाथ ए, मेरे खुदा बख्ष ।
इबादत ……………….

सुन बन्दे, मेरी बख्षी, दौलती गर लुटाई तो, क्या किया ।
इबादत गर खुदगर्जी ने, करवाई तो क्या किया ।
बैठ चैन से अहसास कर, रूह में मुझे फक्त ।
इबादत …………..

पुकार दिलो जान से, खामोषी की आवाज से,
गीत गा जज्बातों के, सांसो के साज पें,
खुद को मिला दे मुझमें, रहूंगा साथ तेरे हर वक्त ।
इबादत …………..

(उर्मिल कपूर)

‘‘ बून्दे ’’

सुरमई रात के अंधेरे में, फूटती रोषनी के साये में ।
ऑगन में थिरकते मोतीयों को मैने देखा ।

छमछम बारीष की ताल पे बुन्दों को नाचते मैंने देखा ।
चमकती बून्दों पे चॉदनी का षबाब था ।

(उर्मिल कपूर)

‘‘ कुदरत ’’

कही लाल, कही पीले,
सफेद फूल, मेरी बगिया में है ।
खिले भगवन की कूची से,
बिखरे सब रंग, आपस में गले है मिले ।

हरी-हरी घास सबको, अपनी बाहों में है समेटे,
देख इसको सब दुख, सब चिन्ता पल में है मिटे ।

घने-घने पेड़ो के, चारो तरफ है सोय,
बैचेन मन को, सदा ही यह है भाये ।

पत्तों की चरमराहट, कभी हवा सग सरसहाट,
रंगीन फिजाओं में लगती है, खामोषियों की थरथराहट ।

तितलियों का उड़ना, चिडियों का चहकना ।
सुबह की नन्ही बूदों से, बगिया का सजना ।

कूदरत के सुन्दर, अद्भूत है यह सिलसिले,
भगवन की कूची से बिखरे,
सब रंग आपस में गले है मिले ।

(उर्मिल कपूर)

‘‘ भजन ’’

मेरे मन के तारों को छेड़ के, प्रभु ना जाना मूंह फेर के – 2
रो रो के मर जाऊँ, गा मैं, ना जाना दिल तोड़ के ।
मेरे मन के तारों को छेड़ के ।

(1) दुनिया ने कितने घाव दिये हैं, दुखती रगों पे पांव दिये है – 2
तू ही सहारा मेरा है प्रभु – 2, ना जाना मुख मोड़ के ।
मेरे मन के तारों को छोड़ के ………….

(2) प्रेम जोत की थाली सजा के, आंसुओ की माला बना के – 2
चौखट पे तेरे आ पौहुंचा मै, ना जाना मुझे छोड़ के ।
मेरे मन के तारों को छोड़ के ………….

(3) जनम जनम की प्यास लिए मैं, मिलने की तोसे आस लिए मैं-2
पलकों से तेरी राह बुहारूं, दर्षन दो दिल खोल के ।
मेरे मन के तारों को छोड़ के ………….

प्रभु ना जाना मूह फेर के,
मेरे मन के तारों को छोड़ के ।

(उर्मिल कपूर)

‘‘ भजन ’’

क्या क्या मै, गुण तेरे गाऊँ, दयालू मेरे – 2
तू ही बता तुझ को, कैसे रिझा़ऊँ – 2
क्या क्या मैं, गुण तेरे गाऊँ ।

(1) दया सागर है तू, ममता की घागर हैं तू – 2
सुखें का खज़ाना है तू, हंसी का पैमाना है तू – 2
चरणों में तेरे मैं, सब कुछ पाऊँ – 2
क्या क्या मैं, गुण तेरे गाऊँँ ।

(2) दुखियों का मान है तू, बख्षन हार है तू – 2
मेहर बरसाता है तू, खुषियों का दाता है तू – 2
सदा मै आगे तेरे, षीष निवाऊँ – 2
क्या क्या मैं, गुण तेरे गाऊँ ।

(3) दीनों की षक्ती है तू, पापों से मुक्ती है तू -2
सब से सुन्दर है तू, प्यार का समुन्दर है तू -2
और मैं कुछ भी कैह नहीं पाऊँ – 2
क्या क्या मै गुण तेरे गाऊँ ।

(उर्मिल कपूर)

‘‘ भजन ’’

तेरे दर पे रख दिये पांओं, पकड़ उगली तू ले जाना – 2
कदम उठते नहीं मेरे, सहारा बन मां ले जाना – 2
तेरे दर पे, रख दिये पाओं ।

(1) मेरी बाहें पकड़ कर मां, लगाना सीने से होगा – 2
मुझे अपना बना तो लिया, गुनाह भी बख्याना होगा – 2
कदम उठते नहीं मेरे, सहारा बन मां ले जाना,
तेरे दर पे, रख दिये पाओं ।

(2) तेरा दर्षन मां पाने को, तरसते दुनियां वाले हैं – 2
झलक अपनी दिखा के मां, प्यास रूह की बुझा देना – 2
कदम उठते नहीं मेरे, सहारा बन मां ले जाना,
तेरे दर पे, रख दिये पाओं ।

(3) मै चल कर आ गया, दर पर, छोड़ पीडे ज़माने को -2
तमन्ना है ये उर्मिल की, सदा तुझ में समा जाना -2

कदम उठते नहीं मेरे, सहारा बन मां ले जाना,
तेरे दर पे रख दिये पांओं । पकड़ उगली तू ले जाना,
कदम उठते नहीं मेरे, सहारा बन मां ले जाना,

तेरे दर पे, रख दिये पाओं ।

(उर्मिल कपूर)

‘‘ भजन ’’

नशा तेरे नाम का – 3, चढ़ता ही जाये ।
नषा तेरे नाम का, चढ़ता ही जाये ।
दिन रात सुबहो षाम, बढ़ता ही जाये ।
नषा तेरे नाम का, चढ़ता ही जाये ।

(1) तुझको मैं हर पल ध्यायूँ, गीत मैं तेरे गाऊँ – 2
सुझे नहीं, मुझे कोई काम – 2, जपता रहूँ मैं तेरा नाम ।
चढ़ता ही जाये-3, नशा तेरे नाम का, चढ़ता ही जाये ।
दिन रात सुबहो षाम, बढ़ता ही जाये,
नषा तेरे नाम का, चढ़ता ही जाये ।

(2) है लै सांसों में तेरी, मस्त है हर रौ तेरी – 2
नहीं कोई मेरी पैहचान – 2, तू ही तो षोभा मेरी षान – 2,
चढ़ता ही जाये-3, नशा तेरे नाम का, चढ़ता ही जाये ।
दिन रात सुबहो षाम, बढ़ता ही जाये,
नषा तेरे नाम का, चढ़ता ही जाये ।

(3) नषा ये है कैसा प्यारे, घुमूँ मैं द्ववारे द्ववारे -2
न ही कोई प्याला, नाही जाम,
बेहका मैं ले के तेरा नाम ।
चढ़ता ही जाये-2, नशा तेरे नाम का, चढ़ता ही जाये ।
दिन रात सुबहो षाम, बढ़ता ही जाये,
नषा तेरे नाम का, चढ़ता ही जाये ।

(उर्मिल कपूर)

‘‘ भजन ’’

संकट है भारी, नहीं त्यारी – 2,
कोई ना मेरा संगी – साथी,
हाथ हैं मेरे दोनों खाली,
संकट है भारी – नहीं त्यारी ।

(1) दान कभी भी, दिया नहीं मैंने,
काम भी अच्छा, किया नहीं मैंने ।
मुष्किल में है, अब ये दुखियारी – 2
संकट है भारी – नहीं त्यारी ।

(2) बोले नहीं, कभी मीठे बोल,
कितने दिलों को, दिया मैंने तोड़,
कौन करेगा, मुझ से यारी,
संकट है भारी – नहीं त्यारी ।

(3) मैंने किया नही, प्रभु तोहे याद,
कैसे सुने गा तू, मेरी फ़रियाद ।
यूं ही उमर, मैंने सारी गंवा दी ।

संकट है भारी – नहीं त्यारी ।
कोई ना मेरा संगी – साथी,
हाथ हैं मेरे दोनों खाली,
संकट है भारी – नहीं त्यारी ।

(उर्मिल कपूर)

3 Comments

  1. Kannu 29/05/2016
  2. sangeeta sikka 31/05/2016
  3. Sanskriti 10/06/2016

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