मैं अंजान फिरा करता हूँ

सत्या को जान कर भी
मैं अंजान फिरा करता हूँ
विपतियों की माला को, मैं
अपने साथ लिए जीता हूँ
पानी के फर्स पर मैं
कागज की नाव लिए फिरता हूँ
एक पल में ही टूट जाएगी
मेरे ख्वाबो की बुनी माला
फिर भी तूफानों में मैं
एक दिप लिए फिरता हूँ
अंधकार रात्री में जब भी, मैं
प्रकाश लिए चाँद को देखा करता हूँ
अपनी एक पहचान बनाने को
सत्या की ऊर्जा साथ लिए फिरता हूँ।

संदीप कुमार सिंह
8471910640

4 Comments

  1. babucm babucm 28/05/2016
  2. संदीप कुमार सिंह संदीप कुमार सिंह 28/05/2016
  3. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 29/05/2016
    • संदीप कुमार सिंह संदीप कुमार सिंह 29/05/2016

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