धर्म धर्म

में धर्म धर्म चिल्लाती रही , मुझे ना मिला धर्म कोई
में रोज़ मंदिरों में जाती रही , मुझे ना मिला सुकून कही

मैंने रोज़ चढ़ाया जल शिव पर , में रोज़ गुरु घर भी जाती रही
मैंने धर्म को समझा सर्वोपरि , में रूठे रब को मानती रही

में सिर्फ पूजा ही करती रही , पल पल गुण भगवान् का गाती रही
मुझे ना दिखा गम किसी का मैँ अपनी खुशिया मनाती रही

फिर एक दिन मुझे समझ आया , मैँ किस धर्म से हूँ आई
जब तक मैँ ना समझू दुःख किसी का मेरा कोई धर्म नहीं भाई

मैँ प्यासे को मरता छोड़ कर , जल शिव को चढ़ाती रही
मैँ खुद ही इस दुनिया मैँ आकर , सिर्फ खुद को ही चाहती रही

ये सारे मंदिर , मस्जिद , गुरु घर सब देते है बस एक ही सिख
करो मदद उसकी, जो निर्बल हैं , जिसे चाइये मदद अभी

जिस पल देखा सोचा और जाना मैंने इस धर्म को
मुझे सब मैँ दिखा भगवन , और हर घर मंदिर सजती रही

में जो हूँ वो हूँ भक्ति , जिसके दिल मैँ भी घर कर जाती हूँ
वहां रहे ख़ुशी , सेवा और समर्पण , मैँ गीत प्यार का हूँ गाती

5 Comments

  1. C.M. Sharma babucm 27/05/2016
    • tamanna tamanna 27/05/2016
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 27/05/2016
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 27/05/2016
  4. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 28/05/2016

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