दुर्भाग्य

पति की मौत से टूट गयी
किस्मत उसकी रूठ गयी
आंसू अपने पीती रही
बेटे की खातिर जीती रही
पति की बची आखिरी निशानी
उसपर न्योछावर थी जवानी
बड़े जतन से उसको रखती
रात और दिन नज़रों से तकती
मेरी जगह भी निभाना फर्ज
पति का था यह आखिरी अर्ज
बच्चे की परवरिश तुम करना
मेरी खाली जगह भी भरना
धीरे-धीरे वक़्त चल दिया
कुछ वर्ष आगे निकल दिया
बच्चे संग सपनों को बुनती
भविष्य की बेहतर राह को चुनती
किस्मत को यह मंजूर न था
दुर्भाग्य उससे दूर न था
बच्चे को साईकिल थी प्यारी
निकला करने उसकी सवारी
भ्रष्टाचार की समाज पर चोट
उससे बचने को नहीं ओट
भारी वाहन शहर के अंदर
प्रवेश-निषेध हो गया छू-मंतर
भ्रष्ट तरीके से चालक लाइसेंस
नहीं रखते चालन का सेंस
बेपरवाह गाड़ी दौड़ाया
बच्चे के जीवन को मिटाया
अब किस उम्मीद पर जीना
किसके लिए है आंसू पीना
बेपरवाह, बेहाल हो गयी
मानसिक संतुलन भी खो गयी
व्यवस्था हो चुकी है राख
निर्दोषों का जीवन ख़ाक
बुराई के हो गए पौ-बारह
अच्छाई न पाये किनारा ।

विजय कुमार सिंह

8 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 27/05/2016
    • विजय कुमार सिंह 27/05/2016
  2. babucm babucm 27/05/2016
    • विजय कुमार सिंह 27/05/2016
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 27/05/2016
    • विजय कुमार सिंह 27/05/2016
  4. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 28/05/2016

Leave a Reply