मां

मां

मेरे आंचल में पलने वालों
यूं मत नोचो आंचल को
आखिर तुम्हारी लगती हूं मां
क्यों पीड़ा पहुंचाते हो मन को ।
मेरा है तुमने दूध पिया
आंचल की छांव में खेले तुम
गोद मेरी रही गिली हमेशा
सूखी जगह रहे हो तुम
आज क्यों फि र बनकर दानव
ललकारते हो जननी को ।
आखिर तुम्हारी लगती हूं मां
क्यों पीड़ा पहुंचाते हो मन को ।
मेरा सारा प्रेम महासागर
न्यौछावर है बेटे तुझपर
मैं हूं तेरे पथ की दर्शक
पाल पोश बड़ा दिया है कर
फि र क्यों मुझको छोटी कहकर
अपमान मेरा करते हो तुम क्यों ।
आखिर तुम्हारी लगती हूं मां
क्यों पीड़ा पहुंचाते हो मन को ।

2 Comments

  1. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 27/05/2016
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 27/05/2016

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