पूछा हवा ने

पूछा हवा ने

एक दिन पुछा मुझसे हवा ने
तुम क्यो बैठे हो थके से ।
तुम्हारी आंखें निस्तेज सी क्यों
जिनमें कोई सपना नहीं क्यों
चेहरे पर उदासी है छाई
जैसे तुम्हारा अपना नही हो
या दिल तोड़ दिया किसी ने ।
एक दिन पुछा मुझसे हवा ने ।
फि र मैनें जवाब दिया उसको
मेरा हृदय है बिल्कुल सच्चा
बांटता फि रता हूं प्रेम सभी को
हर काम मेरा बिगड़ जाता है
चलता हूं जिस काम को करने
एक दिन पुछा मुझसे हवा ने ।
फि र हवा हठीली मुस्कुराई
रोते हुए फि र वह चिल्लाई
मुझे देख रहे हो तुम क्या
मैं यूं नही नही बनी हूं निष्ठूर
कई ठोकरें खिलाई जमाने ने
एक दिन पुछा मुझसे हवा ने ।
मैं भी तुम्हारी तरह ही
बिल्कुल शीतल हृदय थी
लोंगों के दुख दर्दो को
अपना समझ अपनाती थी
निष्ठूर लोगों ने दिये गम सारे।
एक दिन पुछा मुझसे हवा ने ।
तब से लेकर आज तक
गमों में ही पली हूं मैं ।
उन्हीं गमों से पली बढ़ी हूं
उन्हीं से निष्ठूर बनी हूं
तभी तो चंचल लगती हूं मैं ।
एक दिन पुछा मुझसे हवा ने ।

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