जिंदगी

बचपन, जवानी, ग्रहस्थ, बुढ़ापा,
मौत ने गवाही भर दी,
चार पल उधार ले वक्त से,
रचना जिंदगी की कर ली मैंने,
बचपन बेफिक्र, माँ के आँचल में,
हर ख्वाहिश को पूरा करता,
ऐसा हुनर था पिता के हाथो में,
बांध लिया खुद को कुछ रिश्तों में,
गुजरा बचपन बातों ही बातों में,
रचना जिंदगी की कर ली मैंने,
मशगूल बड़ी गुजरी जवानी,
आपा सवारने में,
आहिस्ता कभी तेजी से
दुनिया को पिछाड़ने में,
रचना जिंदगी की कर ली मैंने,
ग्रहस्थ पल में कुछ अलग सा आनंद था,
एक से दो दो से चार होने का,
महलो के महल, पैसो के अम्बार,
लगा दिए मैंने, ना दिन देखा,
ना पता चला रात होने का,
रचना जिंदगी की कर ली मैंने,
ना दुनिया की दौलत, ना कोई इल्म,
बुढ़ापे में काम आया |
वक्त का इकरार हुआ पूरा,
मौत का दूत मुझे लेने आया,
रचना जिंदगी की कर ली मैंने,
मौत मुस्कुराई और लगी पूछने,
क्या साथ लाये थे ? क्या ले जा रहे हो ?
अपने कर्म लिखवा के लाये थे,
वही साथ ले के जा रहे हो,
जीना झूठ, मरना सच,
फिर क्यों घबरा रहे हो ?
रचना जिंदगी की कर ली मैंने,

8 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 26/05/2016
    • mani mani 26/05/2016
  2. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 26/05/2016
    • mani mani 27/05/2016
  3. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 26/05/2016
    • mani mani 27/05/2016
  4. C.M. Sharma babucm 27/05/2016
    • mani mani 27/05/2016

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