दास्ताँ

ख़ामोशी टूटेगी तो हलचल सी मच जाएगी,
आंसुओं की दास्ताँ पर फिर न हंसी आएगी ।
पलकें बंदकर कोई कब तलक पिएगा आंसू,
एक दिन तो ये बारिस भी थम ही जाएगी ।
रूह शरीर के दामन में सिमटी रहेगी कबतक,
मौत की दस्तक पर वह भी उड़ ही जाएगी ।
टूटे हुए सितारे से कोई मुराद मांगता है क्यूँ,
उजड़े हुए गुलशन से कैसे खुशबू आएगी ।

विजय कुमार सिंह

2 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 26/05/2016
  2. mani mani 26/05/2016

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