प्रकृति

शाख से टूटकर किसी पत्ते का गिरना,
हवा के थपेड़ों से इधर-उधर बिखरना,
पथिकों के पांव तले दबना-कुचलना,
फिर एक दिन मिटटी में जा मिलना ।
कुछ वक़्त पर गिरते हैं, कुछ बेवक़्त गिरते हैं,
कुछ स्वतः ही गिरते हैं, कुछ गिरा दिए जाते हैं,
वक़्त-बेवक़्त घटती हैं ये वक़्त की घटनाएं,
कभी समझ आएं कभी ना समझ आएं ।
ऊर्जा का रूपांतरण प्रकृति का है हिस्सा,
कभी उनका किस्सा तो कभी हमारा किस्सा,
इस धरा के अंदर फिर दिल का धड़कना,
यथार्थ ज्ञान पर भी मन का भटकना ।
नित नई ऊंचाइयां छूने की चाह होना,
जो पाया वो देखना, जो खोया वो भूलना ।
अंतर्मन की व्यथाओं को बताना-छुपाना,
ज्ञान के अनन्त छितिज में खुद ही सिमटना,
ये भूल-भुलैया है प्रकृति की ऐसी रचना,
जितना इसे समझना उतना भटकते जाना ।

विजय कुमार सिंह

6 Comments

  1. babucm babucm 26/05/2016
    • विजय कुमार सिंह 26/05/2016
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 26/05/2016
    • विजय कुमार सिंह 26/05/2016
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 26/05/2016
  4. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 26/05/2016

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