बचपना

बचपना

जब याद आता है बचपना
मन भरने लगता है उडारी
चेहरा हो जाता खिला-खिला ।
आंखों में वो शरारती भाव
देह सुडौल हाव-भाव नटखट
करके ऊंची गर्दन चलना
हर काम करते थे झटपट
शरीर होता था तना-तना ।
जब याद आता है बचपना
मन भरने लगता है उडारी
चेहरा हो जाता है खिला-खिला ।
जब होता सर्दी का मौसम
जलाते उपले बीच आंगन
हाथ सेंकते बैठ चारों ओर
मन खुशी से होता प्रसन्न
शक रकंद भुनते आग जला ।
जब याद आता है बचपना
मन भरने लगता है उडारी
चेहरा हो जाता है खिला-खिला ।
गर्मी की तपती दोपहरी में,
जाते गांव के बाहर उपवन में
आंख मिचने का ढोंग रचाकर
पैर दबा चुपके से निकलते
अपने घर वालों को सुला ।
जब याद आता है बचपना
मन भरने लगता है उडारी
चेहरा हो जाता है खिला-खिला ।

2 Comments

  1. C.M. Sharma babucm 26/05/2016
  2. C.M. Sharma babucm 26/05/2016

Leave a Reply