घटाओं

घटाओं

अ हवाओं ऐ घटाओ
आंचल से जरा अपने
पानी की बूंदे गिराओ ।
धरती का तन सूखा-सूखा
पे्रम अश्रुओं का ये भूखा
देख रहा अपलक तुम्हें
इसकी आशाओ को तुम
यूं ना मन से भुलाओ ।
अ हवाओं ऐ घटाओ
आंचल से जरा अपने
पानी की बूंदे गिराओ ।
आज धरा यूं विचलित होकर
उड़ती है धूल खाती है ठोक र
फि र क्यों नही करते तुम सिंचित
इसके कोमल अंगों को और
महका दो फि जाओं को ।
अ हवाओं ऐ घटाओ
आंचल से जरा अपने
पानी की बूंदे गिराओ ।

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