पादुका

बड़े प्यार से चुनते जाकर,
घर ले आते हाथ उठाकर ।
फिर सैर को कदम बहकते,
बड़े जोश में राह पे चलते ।
जबतक चले हो खातिरदारी,
रंग-रोगन हो बारी-बारी ।
सुगम हो राह पांव में आकर,
रक्षा करता खुद को घिसकर ।
बढ़ती उम्र के दबाव में आता,
टूट पड़ता जब पांव में जाता ।
चीर-फाड़ कर जोड़ा जाता,
जबतक चले न छोड़ा जाता ।
नया कोई स्थान जब लेता,
कूड़ेदान में पुराना फ़ेंक देता ।
पादुका किस्मत पर रोये,
भला करे पर बुरा ही होए ।

विजय कुमार सिंह

3 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 25/05/2016
  2. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 25/05/2016
  3. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 25/05/2016

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