स्वप्न

स्वप्न

री स्वप्न तू तो बड़ी चतुर है ।
री स्वप्न तू तो बड़ी निठूर है । ।

पैरो की आहट दाब-दाब
उर के आँगन घुस जाती है।
सारे भेदो को जान-जान,
निद्रा को भेद जाती है ।।
री स्वप्न! तू तो स्पंदन में हीं
घुल जाती है।

अनेक किवारो के पीछे
जो राज दबाए रखा था,
एक आस बुझाए रखा था,
सघन निद्रा की बेला में
तू आते उन्हें जागाती है,
निद्रा तो आती-जाती है,
पर री स्वप्न!तू मेरा मन
क्यों भटकाती है। ।

निद्रा की घोर तिमिरता में
एक पदचाप सुनाई देती है,
काले फैले जालो से
एक परछाई उभरती आती है
ह्रदय की गति बढ़ती है,
एक चीख आन निकलती है,
डर निद्रा को गले निगलती है।
री स्वप्न! तू ये क्या आडंबर
रचती है ।

अवनी-अम्बर की रेखा लाँघ
तारो से चमके
जो प्रियजन,
कभी -कभी तू उनसे भी
आन मिलाती है,
विछोह की पीड़ा में घुलती
करे मेरी जब फैलती हैं,
री स्वप्न! तू निद्रा को तोड़
सब समेटे उड़ जाती है।
बता तू ऐसा क्यों करती है???

री स्वप्न बता
भला तू कौन है
और कहाँ से आई है,
क्या ईश्वर की भेजी
कोई दूत है,
या मेरे रूह की हीं
तन्हाई है । ।

अलका

13 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 24/05/2016
  2. ALKA प्रियंका 'अलका' 24/05/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 25/05/2016
      • ALKA प्रियंका 'अलका' 25/05/2016
  3. Kajalsoni 25/05/2016
    • ALKA प्रियंका 'अलका' 25/05/2016
  4. C.M. Sharma babucm 25/05/2016
    • ALKA प्रियंका 'अलका' 25/05/2016
  5. Rajeev Gupta RAJEEV GUPTA 25/05/2016
    • ALKA प्रियंका 'अलका' 25/05/2016
  6. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 25/05/2016
    • ALKA प्रियंका 'अलका' 25/05/2016
  7. Meena Bhardwaj Meena bhardwaj 21/06/2016

Leave a Reply