एक टुटा काँच : गजल

कितना मजबूर हूँ आज मै खुद के अफसाने से!
उजड़ चुकी है बगिया मेरी महबूब तेरे जाने से!!

तुझको हर पल चाहा पर किसी से कह न सका!!
तू हो गयी किसी की, अब क्या होंगा पछताने से!!

समय दिया था भरपूर तूने, मै ही आ न सका!
तेरी भी क्या गलती, तूम मजबूर थी ज़माने से!!

मुझे गुरूर हद से ज्यादा था अपनी किस्मत पर!
सोचा लिया था कौन रोकेगा तुझे अपना बनाने से!!

बारिश की बुँद भी छुएँ तुझे, बर्दास्त न था मुझे!
अब कैसे रोकूंगा तुझे किसी के बाहों में जाने से!!

सोचता हूँ काश की बचपन में ही तुझे माँग लेते!
हर चीज मिल जाती थी बस दो आँसू गिराने से!!

तू जहाँ भी रहे, हर ख़ुशी पैबंद हो तेरे कदमों में!
मेरा क्या…..
एक टुटा काँच, फर्क नहीं अब और टूट जाने से!!
!
✍सुरेन्द्र नाथ सिंह “कुशक्षत्रप”✍

9 Comments

  1. C.M. Sharma babucm 23/05/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 23/05/2016
  2. sarvajit singh Sarvajit Singh 23/05/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 23/05/2016
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 23/05/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 23/05/2016
  4. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 23/05/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 23/05/2016
  5. mohit pandey 24/05/2016

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