करिश्मायी वक्त

करिश्मायी वक्त

करिश्मायी वक्त की सुनहरी सी कोई छटा दिखी है,
यु ही ये नहीं की सामने से धरा बही है |
खुदगर्ज सी हवाये भी आज यू क्यों बही है,
जैसे बरसो के इंतज़ार के बाद कोई गले लगी है |

यू की दीवारे थी इतनी बरी,
की निशा भी परे थी कब से |
आज रौशन ही रौशन ये गुहा हुई है,
जैसे अन्धयारी सी राते पूरी रौशन हुई है |

क्यों इतनी सी ये चुभन आज नासूर बना है,
जैसे मीठे से दर्द से कोई बेहिसाब कराहा है |
बरवादी ये है कैसी जिसमें लूटके भी कोई मेहगना बना है |

दुखों की परछाई में घिरे थे ईस कदर,
खुशी की कुछ बूंदों के लिये तरसे थे हर कदर |
आज बिन चाहे ही खुशिया ही खुशिया हर तरफ है,
जैसे खुदा का नूर बरसा हो हर कदर |
ख़ुशी ये है कैसी जिसमे कोई रों के भी हँसा है |

– मनोरंजन

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