मौसम की बात

मौसम की बात
कभी गरमी कभी सर्दी
कभी होती है बरसात
समझ से परे है
ये मौसम की बात

गरमियों के दिनो में
शरीर झुलस जाता है
थोड़ी-थोड़ी देर में
गला सुख जाता हैं
सूरज उगलता है अंगारे
खेल नहीं पाते बच्चे बेचारे
हालत हो जाती सबकी खराब
बार-बार लगती हैं प्यास
सबकी प्यास बुझाने
फिर आता है बरसात

प्रकृति जब करती है स्नान
पेड़-पौधे हो जाते फिर से जवान
हर तरफ हरियाली छा जाती
लहलहाते है हर खेत-खलियान

बादल जब करता है शोर
जंगल में नाचता हैं मोर
जिधर जाती हैं नजर
पानी ही पानी हर ओर

फिर आती हैं सर्दी की बारी
बढ़ जाती हैं बीमारी
सुबह उठने को मन नहीं करता
अकड़ जाती हैं शरीर हमारी

हर रोज स्नान नहीं होता
ठंड के कारण काम नहीं होता
घुसकर रजाई में
सब आदमी हैं सोता

जब होता हैं ठंड का अंत
तब आता है सुहाना बसंत
सरसों के खेत हैं लहराते
नये-नये फूल भी आते
रंग-बिरंगी तितली
हर ओर हैं मंडराते

मध्यम-मध्यम शीतल हवा
लगती हैं सुहानी
फूलों पर बैठा भँवरा
लगता हैं नूरानी

हर साल ये मौसम आता
सभी के दिलो को खूब भाता
सर्दी,गरमी या हो बरसात
समझ से परे है मौसम की बात
पियुष राज ,राजकीय पॉलिटेकनिक,दुधानी ,दुमका |

4 Comments

  1. C.M. Sharma C.m.sharma (babbu) 22/05/2016
  2. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 22/05/2016
  3. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 22/05/2016
  4. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 22/05/2016

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