बन्दगी

नज़र मिलाकर अग़र तुझे चले ही ज़ाना था तो दिल्लगी क्यों की!
इंसान के सामने हाँथ फैलाना था तो ख़ुदा की बन्दगी क्यों की!!

तहज़ीब अलग बात है इसे अपनी कमज़ोरी मत बनाना कभी भी!
अग़र साथ ज़िन्दगी गुज़र करना था तो मज़हबी नासमझी क्यों की!!

2 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 22/05/2016
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 22/05/2016

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