सुलगते अलफ़ाज़

मै चुप क्यों हु ?मै खामोश क्यों हु ?
क्यों मेरा खून नहीं खोलता ?
क्यों मै डर के सायो में जिन्दा हु ?
झूठ की चादर में खुद को लपेटे,
क्यों मै सच नहीं बोलता ?
मै चुप क्यों हु ? मै खामोश क्यों हु ?
हर तरफ रंज-ओ-गम,
सुलगते अलफ़ाज़ है,
तुम्हे कुछ हो ना जाये,
डर भरी मेरे चारो तरफ,
अपनों की आवाज़ है,
मै चुप क्यों हु ? मै खामोश क्यों हु ?
उजड़ गए, बिछड़ गए,
बेवजह बे कसूर,
हालात फिर भी ना बदले,
चाहे पास है चाहे वो दूर,
मै चुप क्यों हु ? मै खामोश क्यों हु ?
सब कुछ जान कर,
मै अंजान क्यों हु ?
जुबा होते हुए भी,
बेजुबान क्यों हु ?
मै चुप क्यों हु ?मै खामोश क्यों हु ?
वो कुछ है गिनती में,
मै हजारो में हु,
फिर भी जाने क्यों बेबस लाचार हु,
ये मेरा नहीं तेरा काम है,
मुझे क्या पड़ी है?
मै क्यों सर दर्दी लु,
सोचता हु फिर मै क्यों हिस्सा भ्रस्टाचार,
अत्याचार का हु,
मै चुप क्यों हु ?मै खामोश क्यों हु ?
जमीर बेच दिया मैंने,
जिन्दा हु पर मुर्दो की तरह,
सकूं मिल जाये जहाँ,
मुमकिन नहीं मिल जाये वो जगह,
मै चुप क्यों हु ? मै खामोश क्यों हु ?

2 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 21/05/2016
    • mani mani 21/05/2016

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