मन का बोझ

सुनाता हू दास्ताँ उन्हें अपना समझकर l
अनसुना कर देते है पागल समझकर ll
नहीं कहता तो दिल परेशान हो जाता है l
कहता हू क्योकि मन हल्का हो जाता हैll

कहते है अपने तो अपने होते है l
परायो में भी अपने छिपे होते है ll
कभी अपने भी दगा दे जाते है l
कभी पराये साथ निभा जाते है ll

कैसो हो पहचान समझ न पाया l
कौन है अपना यहाँ कौन पराया ll
मन पर बोझ नहीं रखा जाता l
सो अपना समझ,दुःख बताता ll

जो दुःख आना है वो जरूर आएगा l
बस कह सुनकर कम हो जायेगा ll

हर किसी के दुःख में साथ निभाओ l
कुछ मैं कहू कुछ तुम अपनी बताओ ll
यू ही जिंदगी कह सुनकर गुजर जाएगी l
मन हल्का होगा परेशानी नहीं सताएगी ll

7 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 19/05/2016
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 19/05/2016
  3. babucm C.m. sharma(babbu) 19/05/2016
  4. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 19/05/2016
  5. MANOJ KUMAR MANOJ KUMAR 20/05/2016
  6. नवल पाल प्रभाकर Naval Pal Parbhakar 20/05/2016
  7. Rajeev Gupta Rajeev Gupta 20/05/2016

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