“शायद “

तकदीर मेरी डूबने लगी शायद बस तकदीर के भरोसे बैठे रहने से ।

आवाज मेरी कोई सुन न सका शायद चिल्लाते
रहने से ।

वो खुशिया भी मेरी जाने लगी शायद गम को समेटते रहने से ।

खुद ही बुरे लगने लगे हम उन्हे शायद उनकी बुराईया ढुढते रहने से ।

काजल सोनी

10 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 20/05/2016
  2. babucm babucm 20/05/2016
  3. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 20/05/2016
  4. Kajalsoni 20/05/2016
  5. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 20/05/2016
  6. Kajalsoni 20/05/2016
  7. Meena Bhardwaj Meena bhardwaj 20/05/2016
  8. Kajalsoni 20/05/2016
  9. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 20/05/2016
  10. Kajalsoni 21/05/2016

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