परिन्दे

परिन्दे

उन्मुक्त नील गगन में
विचर रहे कुछ परिन्दे ।
काश, हम भी उड़ पाते
छोटे-छोटे पंख लग जाते
करते हम प्रेम चमन से ।
उन्मुक्त नील गगन में
विचर रहे कुछ परिन्दे ।
कभी धरा पे कभी गगन में
रहते उड़ते फि रते हम सभी
भय न रहता किसी का हमें ।
उन्मुक्त नील गगन में
विचर रहे कुछ परिन्दे ।
ना किसी साथी की चिन्ता
खा लेते भोजन जो मिलता
रहते किसी बगीचे-वन में ।
उन्मुक्त नील गगन में
विचर रहे कुछ परिन्दे ।

2 Comments

  1. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 19/05/2016
  2. C.M. Sharma C.m. sharma(babbu) 19/05/2016

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