अंकुर की पुकार

अंकुर की पुकार

आंधी की तेज रफ्तार में
एक बीज था उड़ रहा
लिए अपने छोटे उदर में
एक अंकुर फि र रहा ।
आंधी की तेज हवाओं ने
धरा खोदकर उसे निकाला
ले अपने आगोश में
चारों तरफ उसे घुमाया
लिए अपने छोटे उदर में
एक अंकुर फि र रहा ।
फि र एक जगर पर वह
छुटा हवा की पकड़ से
आ गिरा धरती पर वह
मिट्टी ने उसे ढक दिया
लिए अपने छोटे उदर में
एक अंकुर फि र रहा ।
ठण्डी हवा का झोंका आया
मन हर्षा प्रफु ल्लित काया
वर्षा आने की सोच वह
अंकुर उसने अपना बढाया ।
लिए अपने छोटे उदर में
एक अंकुर फि र रहा ।
मगर वर्षा ने धोखा दिया
ऊ धर से रूख बदल लिया
मन मसोस कर रह गया
अंकुर उसका मुरझाया ।
लिए अपने छोटे उदर में
एक अंकुर फि र रहा ।
मगर न जाने हवा ने फि र
जाने क्या जादू किया
झोंका दिया वर्षा को
अंकुर पर बरसा दिया
लिए अपने छोटे उदर में
एक अंकुर फि र रहा ।
मन से निकले यदि पुकार
भगवान उसे पूरा ना करे
ऐसा कभी हुआ नही
और कभी ना होगा ऐसा ।
लिए अपने छोटे उदर में
एक अंकुर फि र रहा ।

Leave a Reply