एक बार

एक बार

एक बार मैं
खादी का कुर्ता पहन
बस में यात्रा रहा था कर
परिचालक आया मेरे पास
टिकट लेने को मुझसे कहा
मैं पैसे निकाल ही रहा था ।
तभी पिछे बैठे एक —-
एक बूढ़े फूस व्यक्ति ने
मुझ पर जैसे कटाक्ष किया
इससे पैसे क्यों ले रहे हो साब
इसके पास तो चाकू होगा ।
मैं यहाँ पर जैसे चुप रहा
मुझे एक पल के लिए तो
बस ऐसा ही लगा
मैं यहाँ अंग्रेजों के बीच
आकर जैसे फंस गया
क्या यह वहीं देश है
जहाँ खादी पर ही
बस जोर दिया गया था
क्या यह वही देश है।
जहाँ पर खादी के लिए
विदेशी कपड़ा जला दिया था ।
क्या यह वही देश हैं
जहाँ पर गाँधी जी ने
स्वयं सूत कात कपड़ा बूना
तभी———
जहन में आया कि —
नही वह देश तो अलग ही था
आज का भारत
वह भारत नही रहा
न वह संस्कृ ति रही
और न रहा प्रेम भाव
संस्कृति बचाने वालों को
देखा जाता है बुरी नजर से
दिन दुनी रात चौगुनी
कर रहा है देश तरक्की
पर देश भूल रहा है उसूलों को
और भूल रहा है अपनी संस्कृति ।

2 Comments

  1. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 17/05/2016
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 17/05/2016

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