गरीब की आँखें

गरीब की आँखें

मलिन सा चेहरा
गिरती उठती हौले-हौले
तन पर फ टे हुए कपड़े
जरूर ये आँखें
किसी गरीब की हैं ।
गरीबी की अकड़ ने
तोड़ कर रख दिये काँधे
टेढ़े-मेढ़े बिखरे बाल
निस्तेज निष्ठूर गोरे गाल
गड्ढ़ों में धँसती हुई सी
जरूर ये आँखें
कि सी गरीब की हैं ।
लक्ष्य बिन्दू पर अटकी सी
ज्यों दे रही चुनौती
हर तुफां से लडऩे की
सहमी दुख झेलने वाली
जरूर ये आँखें
किसी गरीब की हैं ।

3 Comments

  1. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 17/05/2016
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 17/05/2016
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 17/05/2016

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