तुम्हारा वियोग

तुम्हारा वियोग

तुम्हारे इस वियोग से
फूट पड़ा शब्दों का भंडार
लिखी छोटी सी एक कविता
बन गया मैं भी रचनाकार।
एक छोटे से घड़े में
शब्द समाये थे असीमित
लगी जो ठोक र हमें तो
छाप गई घड़े की मिट
मिट्टी में मिल गई मिट्टी
शब्दों का उड़ चला गुब्बार ।
तुम्हारे इस वियोग से
फूट पड़ा शब्दों का भंडार ।
उड़ती हुई गुब्बार रूपी धूल में
चुने हुए कंपित उन शब्दों से
बनने लगे स्वर और व्यंजन
बनने लगी पंक्तियाँ धूल में
कलम छाँट कर लिखने लगी
लाने लगी कागज पर उभार ।
तुम्हारे इस वियोग से
फूट पड़ा शब्दों का भंडार ।

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  1. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 17/05/2016

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