आरक्षण

आरक्षण ने तंज कसा है
प्रतिभाओं के पंख कुतर कर,
रोजी रोटी मिलना था पर
हाथ धरे बैठे है घर पर,
अन्य सदन पैदा जो होता
कम से कम आरक्षण मिलता|

पढ़ा-लिखा सब गया अकारथ
तंत्र-मंत्र सब भूल गए ,
दिन भर खटटा है बैलों-सा
हाथ पैर सब सूज गए ,
काश! अगर ये हाथ न होता
कम से कम आरक्षण मिलता|

बदतर हुआ घर का जो चलना
शहर गया फिर घर को आया,
जिस पद का हक़दार था वो
आरक्षण वाला ऐंठ ले गया,
काश! अगर वो अँधा होता
कम से कम आरक्षण मिलता|

कटा हाथ है पैर भी कट गया
आँखें फूटी कान भी फट गया,
जाति-धर्म और नाम बदल लिया
घर-परिवार इतिहास बदल दिया,
खून जम गया साँसे थम गई
उसका जीवन शुन्य हो गया,
काश! अगर ऐसा भी होता
मृत्यु में भी आरक्षण मिलता|

4 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 16/05/2016
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 16/05/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 16/05/2016
  3. mani mani786inder 16/05/2016