फ़ैसला (नज़्म)

मैंने खिड़कियों के शीशे इसलिये भी तोड़ दिए
इक दीवार सी बन गयी थी नज़रों में
इस पार से उस पार साफ़ नहीं दिखता था
गर्द दिखती थी
मुझे बाहर की हवा नहीं आती थी
मुझे वो साँस नहीं मिलती थी
जिसे मैं भीतर तक भर लेना चाहता था

कुछ कुछ ऐसी ही बात थी
कि तुमसे रिश्ता तोड़ लिया मैंने
तुम्हारे और मेरे दरम्यान
सब कुछ था
बस हम ही नहीं थे
अहसास मरने लगे थे अन्दर ही अन्दर
मुझे अपना ही वजूद नहीं मिलता था
वो वजूद जिसने मुझे मुहब्बत करना सिखाया था।

6 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 15/05/2016
  2. आभा आभा 15/05/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 15/05/2016
  3. babucm C.m. sharma (babu) 15/05/2016
  4. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 15/05/2016

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