उलझी पीड़ा

मेरे उलझे अलको में
फंसे हैं जो
मेरे दृग के मोती,
खोज सकता है
तो खोज ले उनको
तेरे हीं दिए दर्द की
है वो पूंजी ।

तुझको शायद ज्ञात नहीं
तू मेरा प्रिय
मैं तेरी प्रियसी,
तू मेरा नग
मैं तेरी तटनी,
पर दर्प की सर्द चादर ओढ़,
तूने जो ये रेखा खींची,
मंजिल -मंजिल दिखती धुंधली,
प्रेम बनी है झूठी,
धरा सी फैली मैली आँचल,
अब बूंदों से नहीं धुलती।
अब बूंदों से नहीं धुलती। ।

अलका

14 Comments

  1. mani mani786inder 14/05/2016
    • ALKA ALKA 15/05/2016
  2. Meena Bhardwaj Meena bhardwaj 14/05/2016
    • ALKA ALKA 15/05/2016
  3. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 14/05/2016
    • ALKA ALKA 15/05/2016
  4. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 14/05/2016
    • ALKA ALKA 15/05/2016
  5. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 14/05/2016
    • ALKA ALKA 15/05/2016
  6. C.M. Sharma C.m. sharma (babu) 15/05/2016
    • ALKA ALKA 15/05/2016
  7. Jay Kumar 15/05/2016
    • ALKA ALKA 15/05/2016

Leave a Reply