“सच”

सुना था कभी
साहित्य समाज का दर्पण होता है
अक्स सुन्दर हो तो
गुरुर बढ़ जाता है
ना हो तो
नुक्स बेचारा दर्पण झेलता है
सोच परिपक्वता मांगती है
आइना तो वही दर्शाता है
जो देखता है
झेला भोगा अनुभव कहता है
उमस और घुटन का कारण
हमारी सोचों के बन्द दरवाजे हैं
हवाएँ ताजी और सुकून भरी ही होंगी
दरवाजे और खिड़कियाँ खोलने की जरुरत भर है
हम से समाज हम से प्रतिबिम्ब
तो दोष के लिए उठी हुई उँगली का इशारा
किसी एक की तरफ क्यों है ।।

“मीना भारद्वाज”

10 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 14/05/2016
    • Meena Bhardwaj Meena bhardwaj 14/05/2016
  2. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 14/05/2016
    • Meena Bhardwaj Meena bhardwaj 14/05/2016
  3. ALKA प्रियंका 'अलका' 14/05/2016
  4. Meena Bhardwaj Meena bhardwaj 14/05/2016
  5. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 14/05/2016
  6. Meena Bhardwaj Meena bhardwaj 14/05/2016
  7. C.M. Sharma C.M. Sharma (babbu) 15/05/2016
    • Meena Bhardwaj Meena bhardwaj 15/05/2016

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