पतझड़

पतझड़

जिन्दगी के सफ र में
मोड़ आएं हैं कैसे
जो कभी होते थे अपने
आज बिछुड़ रहे हैं जैसे।
वर्ष भर बिताया साथ
अपनों की तरह
आज छोडक़र चल दिये
गैरों की तरह
क्यों फि र लगे थे
पेड़ से —–
ये पेड़ के प्यारे पत्ते।
जो कभी होते थे अपने
आज बिछुड़ रहे हैं जैसे।
जिन्दगी में यदि
बिछुडऩा ही है सही
तो भगवान ने फि र
लगाये थे ये मैले कैसे
मैले लगा कर मिला दिये
लोग बुरे और अच्छे
जो कभी होते थे अपने
आज बिछुड़ रहे हैं जैसे।

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