सेवा

सेवा

अपनी मातृभूमि की सेवा
मैं भी करना चाहता हूँ ,
इसकी रक्षा में न्यौछावर
जीवन सारा करना चाहता हूँ ।
सोचता हूँ बनूं सैनिक मैं
पहरा दूं सीमाओं पर
दुश्मन को कर ढेर दूं मैं
उठा हुआ सिर उतार कर
हर क्षण वीर रहूं बना खड़ा
सर्दी-गर्मी झेलना चाहता हूँ ।
अपनी मातृभूमि की सेवा
मैं भी करना चाहता हूँ ।
या फि र बनकर सेवक मैं
हर क्षण सेवा करता रहूं
दीन दुखियों का सहायक बनूं मैं
तन-मन-धन से सहायता करूं
मेरा संचित अमूल्य धन मैं
उन पर लुटाना चाहता हूँ ।
अपनी मातृभूमि की सेवा
मैं भी करना चाहता हूँ ।
मगर अफ सोस है ये मुझे
जन्म हुआ है गरीब घर में
लकवा लगा है तन पे मेरे
धन की जगह ली गरीबी ने
फि र भी सैनिक सेवक बन मैं
क्यों उडारी भरना चाहता हूँ।
अपनी मातृभूमि की सेवा
मैं भी करना चाहता हूँ ।
आज भ्रष्ट हुए हैं लोग
हर जगह रिश्वत का ढोंग
अमीर वर्ग बना है अमीर
गरीब का निवाला लिया है छह्वीन
इन सभी भ्रष्ट लोगों को मैं
सेवा सिखाना चाहता हूँ।
अपनी मातृभूमि की सेवा
मैं भी करना चाहता हूँ ।

2 Comments

  1. gayatri dwivedi 12/05/2016
  2. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 12/05/2016

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