वही जनपद

वही जनपद जो कला नहीं जानता, पढ़ता है तुलसी कृत रामायण -– कवि अपने भूखे-दूखे जनपद को मृत्य की दूरी से देखता है, अब कोई सुधार नहीं हो सकता जीवन में न कविता में विचित्र कूट है दोनों का ।
हो सकता है रामकथा महज़ राम की कथा न हो । हो सकता है यह जनपद एक अवसन्न छाया हो मृत्यु की दूरी से होती हो जो गोचर । हो सकता है कवि त्रिलोचन कभी हुए हों सजल, उठ बैठे हों सपनाय जब वे नहीं रहेंगे किस बिधि होगी होम कबिता इस घाट पर ।

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