हाथ में ख़ंजर रहता है

जब  देखो तब हाथ में ख़ंजर  रहता  है,

उसके  मन  में  कोइ  तो डर रहता  है |

चलती रहती  है हरदम एक आंधी   सी,

एक  ही  मौसम  मेरे भीतर  रहता  है |

दीवारों  में  ढूँढ़  रहे हो  क्या  घर को,

ईंट   की दीवारो में क्या  घर रहता  है |

गुज़र   रहे  हैं   बेचैनी   से    आईने

चैन से  लेकिन हर एक पत्थर रहता है |

तंग  आ  गया हूँ मैं  उस  की बातो से,

कौन   है  ये  जो  मेरे भीतर रहता है |

गौर  से देखा  हर अक्षर  को तब जाना,

प्रश्नों   में  ही  तो हर  उत्तर  रहता  है |

थोडा   झुक कर रहना भी तो सीख कभी,

चौबीसों  घंटे  क्यो   तन कर  रहता है |

Leave a Reply