दायरों में रहकर

तुमसे कोई शिकवा नहीं है
कोई तकलीफ गिला कुछ भी नहीं है
जो चाहो रुक जाओ
चाहो चले जाओ
मुझे इल्म है
तुम्हारी उलझनें है कुछ
कुछ तुम्हारी हदें भी हैं
तुम्हारी दुनिया
मेरे ख़्वाब एक दूसरे से जुदा बहुत हैं
तुम आज़ाद थे सदा
आज भी हो
इन निस्बतों से
इन ज़रूरतों से
मैंने तुमसे दायरों में रहकर
मुहब्बत नहीं की है।

11 Comments

  1. C.M. Sharma babucm 11/05/2016
  2. आभा Abha.ece 11/05/2016
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 11/05/2016
  4. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 11/05/2016
  5. आभा आभा 11/05/2016
  6. आभा आभा 11/05/2016
  7. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 11/05/2016
  8. Gayatri Dwivedi 11/05/2016
  9. आभा आभा 11/05/2016
  10. आभा आभा 11/05/2016

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