तेरी दासी

तेरी दासी

हां मैं तेरी दासी बनकर
तेरे चरणों में रह लूंगी ,
तेरे संग कांटों पर चलकर
हर दुख तेरा अपना लूंगी ।
क्या सोचता है तू मुझको
नारी कोमल मृदु होती है
हाथ लगाने पर जो नारी
फू लों सी मुलायम होती है
पर मैं वो फू ल ही सही
जो कांटों को तेरे ढक दूंगी ।
हां मैं तेरी दासी बनकर
तेरे चरणों में रह लूंगी ।
आंख फे र ना तू मुझसे
तुझसे ही मेरी हस्ती है
साथ तेरा जो मिले मुझे तो
देख मेरी क्या चलती है
तेरी राहों में मैं बिछकर
मंजिल तक तेरे पहुंचा दूंगी ।
हां मैं तेरी दासी बनकर
तेरे चरणों में रह लूंगी ।
हर नारी कोमल है जरूर
मगर इतनी कोमल भी नही
वक्त पड़े चट्टान बने
एक जगह पर रहे अड़ी
मुझको अपने साथ में ले ले
तुफानों में काम आऊंगी ।
हां मैं तेरी दासी बनकर
तेरे चरणों में रह लूंगी ।

4 Comments

  1. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 11/05/2016
  2. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 11/05/2016
  3. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 11/05/2016
  4. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 11/05/2016

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