सहारा

सहारा

आज का मानव
कितना बेबस हो चुका है
कदम-दो-कदम चलने में भी
उसे किसी———–
सहारे की जरूरत है
सहारा किसी
मानव का नही
और न किसी जीव का
सहारा चाहिए तो बस
मानव द्वारा निर्मित
कि सी मशीन का
कदम जमीन पर रखना
मानव को गंवारा नही
हम वहीं मानव हैं
जो कभी
रहते थे जीवों पर निर्भर
मानता हूं
पहले भी कभी
हमारे पुरखों ने
कहने को हम उनके
वंशज हैं
कभी जमीं पर
पैर उन्होंने रखे नही
घुमते थे पेड़ो पर
सोते थे पेड़ो पर
रहते थे पेड़ों पर
पर उन्हें
इस भूमि से
बे-इंतहा प्रेम था
धरती पर पैर
रखने से पहले
कई बार इसे चूमते थे
पर आज का इंसान
इसके हृदय को
रौंदता हुआ
अपने स्वार्थ को पूरा कर
आगे बढ़ जाता है
धरती का हृदय
करूणा से ओत-प्रोत
पानी-पानी हो जाता है ।

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  1. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 11/05/2016

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