नारी के अनेक रूप

नारी के अनेक रूप

दुर्गा-काली की रूप हैं नारी
हर रूप मे लगती है न्यारी
कभी माँ,कभी बहन
कभी बेटी तो कभी बहु बन जाती
हर रूप में वो ,अपना फ़र्ज़ निभाती

माँ बनकर लोरी सुनाती
बहन बनकर हक़ जताती
बेटी बनकर फर्ज़ निभाती
पत्नी बनकर प्यार जताती

पृथ्वी से भी ज्यदा
सहने की है शक्ति
सारा दिन काम करती
फिर भी नही वो थकती

खुद सारे दुःख सहकर
रखती है हमें वो खुश
फिर भी होता है उनका अपमान
यह है बहुत बड़ा दुःख

भारत जैसे देशों में
पूज्नीय है नारी
फिर भी हो रही प्रताड़ित
देख रही दुनिया सारी

हर पुरुष के जीवन में
नारी का साथ होता है
जो नहीं करता उनकी इज़्ज़त
वो जीवन भर रोता है

हर दुःख सहती है नारी
फिर भी रहती है चुप
माँ,बहन,बेटी है…
नारी के अनेको रूप
पियुष राज,राजकीय पॉलिटेक्निक,दुधानी, दुमका।

2 Comments

  1. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 11/05/2016
  2. Gayatri Dwivedi 11/05/2016

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