पानी और ऊमश

पानी और ऊमश

काली घटाएं
आ-आ कर
धरती का दामन
फि र से
चूमने लगी हैं
लग कर
धरती के सीने से
इसके मन के
आन्तरिक कोनों को
झकझोर कर
मन को प्रफु ल्लित
करने लगी हैं ।
हर तरफ
हरियाली का मंजर
मोर की ध्वनि से
सारा वातावरण
शोभायमान
कोयल फि र से
कूकने लगी हैं
बयार कभी शीतल
तो कभी गरम
तन भी तर
पसीने से ।
तो कभी तर
बारिश की बूंदो से
कभी ठंडा तन तो
कभी पसीने
छूटने लगे हैं ।

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