चलते जाना है।

वक़्त की तरह
आदमी चलता रहता है
रुकता नहीं है
कुछ मुकाम उसने बनाए हैं
कुछ मुकाम उसकी खातिर बने हैं
कुछ रास्ते उसने बनाए हैं
कुछ रास्ते उसकी खातिर बने हैं
रिश्तों की दहलीजों पर
अपनों की उम्मीदों पर
आदमी दौड़ता है
एक नयी लड़ाई हर रोज़ लड़ता है
उलझनों से लड़ता हुआ
कभी गिरता है
कभी संभलता है
चलना उसकी फितरत है
हिम्मत ही उसकी शोहरत है
इक ख़्वाब लिए आँखों में
मुश्किलों से भरी रहगुज़र में
ख़ामोश हुए इक अनजान सफ़र में
आदमी ने बनना है कभी
कभी तो मिटते जाना है
साँसों की होड़ में उसने आख़िर
चलना है
बस चलते ही जाना है।

3 Comments

  1. C.M. Sharma babucm 11/05/2016
  2. आभा Abha.ece 11/05/2016
  3. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 11/05/2016

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